गुरुवार, 15 मई 2014

चुनावी मुद्दों में लापता कला संस्कृति

चुनावी महासमर के बाद अब इसके परिणाम भी सामने हैं। राजनीतिक बयानबाजी से हमेशा दूर रहने वाली 'मूमल' ने चुनावी शोर के दौरान ममता बनर्जी की एक पेंटिंस पर हुई पॉलिटिक्स पर एक समाचार से अपने कलाकार पाठकों को जरूर अवगत कराया और कोई ऐसी चर्चा नहीं की जिससे किसी राजनीतिक दल की ओर उसका रुझान दिखे। अब यह विचार जगजाहिर किया जा सकता है कि लोकसभा के भीषण चुनावी महाप्रचार में होना तो ये चाहिए था कि मुद्दे भी उतने ही अर्थपूर्ण, सरोकारी और सुदूर भारत तक के होते, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सत्ता की ऐसी झपटमारी रही कि राजनैतिक गर्जनाएं तो खूब सुनी गई, लेकिन कला या सांस्कृतिक गूंज कतई नहीं। एक पेंटिंग को लेकर बवाल जरूर हुआ वह भी खालिस राजनीतिक। वह भी मनी लाड्रिंग का ऐसा मुद्दा जिस पर मूमल में एक साल पहले व्यापक चर्चा हो चुकी थी।
संस्कृति-विहीन चुनाव
आपने इसे आसानी से राजनैतिक दलों के चुनाव प्रचारों में देखा होगा। वहां लोगों की सांस्कृतिक जरूरतें अभिव्यक्त नहीं हो रही थी। क्या कला और संस्कृति और मनुष्य की कुल जमा बेहतरी के बारे में वहां कोई जगह आप देख पाए? कार्यकर्ता और समर्थक के तौर पर तो आपको कुछ बुराई नजर नहीं आएगी, लेकिन आम नागरिक की निगाह से देखें तो चुनाव 2014 एक संस्कृति-विहीन चुनाव दिखता रहा। जहां राजनैतिक बौखलाहटों, ताकत की इतराहटों और अट्टहासों के बीच गरिमा, नैतिकता और अन्य मानवीय मूल्यों की आपराधिक अनदेखी की जाती रही, वहां कला-संस्कृति की बात करना ही बेमानी था।
बस इतनी ही संस्कृति रही
...और सांस्कृतिक जरूरतों के नाम पर हम क्या देखते हैं? हम पाते हैं कि धर्म और आस्था के वही रटे-रटाए और न जाने कब से दोहराए जाते रहे प्रतीकों को ही हमारे लोगों अर्थात कलाकारों के आगे कर दिया गया। बस इतनी ही संस्कृति रही। मिसाल के लिए बनारस को ही लें। बनारस का ऐसा घाटकरण कर दिया गया, मानो उसके आगे और अंदर कोई बनारस ही न हो. सारी बहसें सारा मीडिया घाटों और नकली अध्यात्म के हवाले से चुनावी गणित में अपने तीर-तुक्के चलाता रहा।  वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने अपने अनूठे रोड़ शो में ठीक ही कहा कि बनारस सिर्फ  घाट नहीं, वो उस बनारस को समझने के लिए निकले जो भारतीय भूगोल का एक अनजाना अदेखा और अस्पृश्य हिस्सा है। उन दलित उपेक्षित समाजों की कलात्मक और सांस्कृतिक जरूरत क्या बनारस का रंगारंग बनाया जा रहा चुनाव पूरी कर पाया? महापर्व बताए जा रहे चुनाव में इस बेहाली को शामिल क्यों नहीं किया जा सका? क्या ये नादानी रही या ये  एक सोचा-समझा गणित।
 काश! कोई तसल्ली मिलती
 इन चुनावों ने सबसे ज्यादा अगर आशंकित किया है तो सांस्कृतिक लिहाज से ही किया है। उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा संस्कृति, कला और समाज के प्रति क्या नजरिया रखती हैं, ये कोई रहस्य नहीं। इसीलिए चिंताएं तो होगी ही। काश!  अगर राजनैतिक दलों के प्रचार अभियानों में हमें इन चिंताओं और आशंकाओं का जवाब मिल पाता। कोई तसल्ली मिलती, कोई पक्का ठोस नैतिक आश्वासन। कला अकादमियों पर कोई ऐक्शन प्लान।
एक बेढंगे राष्ट्र के निर्माण की दिशा
ऐसा लगता है कि देश के कला या सांस्कृतिक ढांचे की सुरक्षा की बात आते ही राजनैतिक दलों और उनके अंधभक्तों को नींद आ जाती है। चुनाव संस्कृति का इससे बड़ा अभिशाप और क्या हो सकता है कि मनुष्य जीवन की कलात्मक कोमलताओं, संवेदनाओं, अनुभूतियों और नैतिकताओं के निर्माण की कार्रवाइयों और प्रयासों से वो बिलकुल खाली हो। जो समाज अपनी कला और अपने लोक-मूल्यों की हिफाजत में नाकाम रहता है वो कितनी भी तरक्की कर ले, बढ़ता तो वो एक बेढंगे राष्ट्र के निर्माण की दिशा में ही है। इतिहास में इसकी कई मिसालें हैं।
सबसे जरूरी सांस्कृतिक जरूरत
एक चुनाव में एक मतदाता की सबसे मानवीय और सबसे जरूरी सांस्कृतिक जरूरत क्या हो सकती है? वो हो सकती है उसकी संवेदना और उसकी निजी खुशियों की सुरक्षा। उसके सांस्कृतिक भूगोल की रक्षा। अपनी मिट्टी, अपनी अभिव्यक्ति, अपनी भाषा और अपनी परंपरा से बेदखली से सुरक्षा। क्या आज का चुनाव और आज के राजनैतिक दल ये आश्वासन और ये भरोसा दिला पाने की स्थिति में हैं? क्या वे दिल पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि उनके घोषणापत्रों में आम भारतीय जन की व्यथा-कथाओं और उनकी सांस्कृतिक अपेक्षाओं को समझने का कोई ईमानदार अध्याय है?
चलते...चलते मूमल अलर्ट
राजस्थान प्रदेश के परिपेक्ष में देखें तो यहां कला और संस्कृति के संरक्षण और कला गतिविधियों के नाम पर जो कुछ हुआ और हो रहा है वह किसी से छुपा नहीं है। 
आने वाले दिनों में गुलाबी नगर की कला और संस्कृति का केंद्र रही एक और विरासत का आमेर की हवेलियों वाला हश्र होने लगे तो हमें आश्चर्य नहीं होगा। लोग इसे आसानी से पचा लेगें..., लेकिन इन सांस्कृतिक चुप्पियों का क्या अर्थ है?  
हम एक एकांगी और खास आर्थिक सोच से निर्धारित सत्ता संरचनाओं की ओर बढ़ रहे हैं। हमारी बहुलतावादी संस्कृति और सांस्कृतिक सामाजिक वैविध्य इसकी इजाजत तो नहीं देते. उसकी खिड़कियों और दरवाजों ने अभी इतनी जंग नहीं खाई है कि कोई उन्हें उखाड़ कर वहां दीवार ही लगा दे।

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शुक्रवार, 2 मई 2014

मनी लांड्रिंग की पेंटिंग्स बनी मुद्दा

अब पेंटिंग पर भी पॉलिटिक्स 
मनी लांड्रिंग की पेंटिंग्स बनी मुद्दा
पहला निशाना ममता बनर्जी पर
मूमल नेटवर्क, जयपुर। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कला और उनकी कलाकृतियों की अप्रत्याशित कीमत का रहस्य अब पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को भी परेशान करने लगा है। कॉरपोरेट जगत में भीतर की जानकारियां लेने के बाद अब मोदी ने कला बाजार की कारगुजारियों को जानने का प्रयास भी किया है। इसे देखकर तो यही लगता है कि 'अबकी बार मोदी सरकार' वाकई सत्ता में आई तो इंडियन आर्ट मार्केट की असलियत को अलग से खंगाला जाएगा।
दिल्ली की कुर्सी के लिए चुनावी संग्राम के चलते ममता बनर्जी की पेंटिग्स की कीमतों को अब मुद्दा बनाकर भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने भले ही अब पेंटिंग्स पर पॉलिटिक्स शुरू की है, लेकिन कला जगत में यह मुद्दा पुराना है। कला बाजार की आड़ में चलने वाले मनी लांडिं्रग के खेल को लेकर मोदी ने ममता बनर्जी पर तीखे हमले करते हुए उनकी पेंटिंग्स की कीमतों पर ही सवाल उठा दिए। उन्होंने कहा कि दीदी की पेंटिंग्स शुरू में ही आठ से दस लाख रूपए में बिकती थी। उसके बाद अब वह पेंटिंग्स एक करोड़ 80 लाख में कैसे बिकने लगी। इसे किसने खरीदा? उन्होंने ये बातें ममता बनर्जी को उनके घर में घेरने के लिए श्रीरामपुर में एक रैली में कहीं। हालांकि इस पर तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता डेरेक ओ ब्रायन ने पलटवार करते हुए कहा कि मोदी के पास अगर पेंटिंग्स की ब्रिकी को लेकर किए गए दावों से संबंधित सबूत हैं तो इसे सिद्ध करें, नहीं तो वह मानहानि के मुकदमे के लिए तैयार रहें।

मूमल ने उठाया था यह मुद्दा
कला बाजार पर नजर रखने वाली मूमल डेस्क सेलीब्रिट्री कलाकारों की कलाकृतियों की कीमतों और उनके खरीदारों पर खास नजर रखती रखती रही है। इनमें बॉलीवुड के अभिनेताओ से लेकर बड़े बिजनेसमैन और कुछ नेता भी शामिल हैंं। इन्हीं में एक ममता बनर्जी भी रही हैं। इनकी कृतियों, प्रदर्शनियों और बिक्री के विवरण मूमल समय-समय पर प्रकाशित करती रही है। पिछले बरसों में बिकी उनकी पेंटिंग की अधिकतक कीमत 80 हजार रुपए थी। पिछले साल इन्हीं दिनों कोलकाता की एक चिट फंड कंपनी शारदा ग्रुप के साथ ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के गहरे रिश्तों की परतें खुलने के साथ ही यह अंदाजा भी लगने लगा था कि पेंटिंग्स के जरिए मनी लांड्रिंग का कारोबार कितनी तेजी से पनप रहा है। राजनेता ममता बनर्जी की कलाकृतियों की मंहगी कीमत और धड़ाधड़ बिक्री के राज भी कला बाजार को अचंभे में डाल रहे थे।
इससे पहले तक एक के बाद एक हो रही अपनी कला प्रदर्शनियों में कलाकार ममता बनर्जी यही कहती रही हैं कि  'उगाही के माध्यम से धन इक_ा करने के बजाए अगर हम इस तरह के रचनात्मक कार्यों के माध्यम से धन इक_ा कर सकें तो हमें ऐसा करना चाहिए।Ó वे यह भी बताती रही हैं कि रॉयटर्स बिल्डिंग में पार्टी के काम-काज के दौरान कड़ी मेहनत के बाद जब उनका सिर भारी हो जाता है तो वह दस से पंद्रह मिनट तक पेंटिंग करती हैं। ममता हर बार जोर देकर कहती है कि यह उनकी रुचि है, पेशा नहीं।
यह सवाल भी उठने लगे थे कि हर बार मात्र दस से पंद्रह मिनट तक पेंटिंग करने के बाद भी वे इतना काम कर लेती हैं कि आए दिन उनकी पेंटिंग्स की प्रदर्शनियों के समाचार आते रहते हैं और उनमें यह सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात होती है कि सभी प्रदर्शित पेंटिंग्स बिक जाती हैं। वह भी लाखों और करोड़ों में।
उन्हीं दिनों कोलकाता के टाउन हॉल में अपनी 250 पेंटिंग्स की प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए टीएमसी अध्यक्ष ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी के लोगों को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि वह उगाही के खिलाफ  हैं और अपनी पेंटिंग बेचकर पंचायत चुनावों के लिए धन इक_ा करेंगी। बनर्जी ने कहा था कि इस काम से उन्हें काफी राहत मिलती है। उन्हीं दिनों एक प्रदर्शनी में उनके 55 काम प्रदर्शित किए गए, जाहिर है सभी काम पहले ही दिन बिक भी गए। इनमें सबसे छोटा और कम कीमत का काम 80 लाख का था।

खरीददारों में राजस्थानी भी
ममता बनर्जी कि कलाकृतियों के खरीदारों में ज्यादातर वही उद्योगपति हैं जिनका कारोबार पश्चिम बंगाल में हैं। चिट फंड कंपनी शारदा ग्रुप के सुदिप्तो सेन उन खरीदारों की सूचि में हैं जो ममता की कोई भी कलाकृति एक करोड़ से कम में नहीं खरीदते। हर्ष नेयोतिया और संजय बोस के नाम भी प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं। ममता बनर्जी की कलाकृतियों के कद्रदानों में प्रवासी राजस्थानियों की संख्या भी काफी है। ममता की कलाकृतियों के राजस्थानी खरीदारों में नए नाम संजीव गोयनका और ऋषि अग्रवाल के शामिल हुए हैं।
कंपनी के चेयरमैन सुदीप्तो सेन को गिरफ्तार कर मनी लांड्रिंग की इस तकनीक का पूरा गणित खोले जाने की कवायद की गई थी, लेकिन वक्त के साथ यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया। -राहुल सेन

मूमल मीमांसा 
जैसे-जैसे कला को एक निवेश के रूप में विश्व समाज द्वारा स्वीकृति मिलने लगी है, वैसे-वैसे इस निवेश की आड़ में कई गोरखधंधे भी पनपने लगे हैं। नेता हों या अभिनेता अचानक कलाकार के रूप में सामने आने लगे हैं। पेंटिंग्स में वो क्या कलाकारी करते हैं, यह तो पता नहीं लेकिन काले धन को सफेद करने की उनकी यह कला जरूर समझ में आ रही है। इन सब के पीछे उनका सेलिब्रीटी होना भी काम का सिद्ध हो रहा है।
चूंकि, अभी तक कला के मूल्यांकन की कोई ठोस व स्थायी नीति नहीं बन पाई है, अत:एव ये सेलिब्रिटीज लोग जो बना रहे होते हैं, उनका तैयार किया गया खरीददार काफी बड़ी रकम देकर उसे खरीद लेता है। बहुत ही कलात्मक और योजनाबद्ध तरीके से ये खरीददारियां काले धन को सफेद में बदली कर देती हैं।
चूंकि कलाकार बनने के लिए किसी ऐकेडेमिक प्रोफाइल की जरूरत नहीं रहती, इसलिए ये लोग बहुत ही आसानी से कलाकार के भेस में आकर अपना मतलब सिद्ध कर जाते हैं। ऐसे कलाकारों में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नाम  प्रमुखता से उभर कर सामने आया है।
अभी आस-पास के दिनों की बात करें तो बालिवुड के सलमान खान से लेकर श्रीदेवी तक के नाम भी कलाकार के रूप में पत्र-पत्रिकाओं में प्रसिद्धि पा चुके हैं। थोड़ा सा पीछे चलें, कुछ महीने पहले तो आपको याद आएगा, कई प्रशासनिक अधिकारी या उनके परिजन न केवल कलाकार के रूप में सामने आए बल्कि उनकी बनाई कृतियां महंगे दामों में खरीदी भी गई। मूमल ने तब भी इस बात की गंभीरता के प्रति अपने कलाकार व कलाप्रेमी पाठकों को इस ओर चेताया था। आज स्थिति और गंभीर होती जा रही है। ऐसे लोग जो सीधे-सीधे जनता के खून-पसीने की कमाई को हड़प रहें हैं और उसी को कला के नाम पर अपनी उजली कमाई के रूप में शो कर रहे हैं। समाज का सशक्त वर्ग अपनी जरूरत और मतलब के चलते उन पर मेहरबान रहता है और संरक्षण दे रहा है।
भारत के भ्रष्टाचारी और कई असामाजिक तत्व जो अपने कारनामों के चलते विश्व भर में पहचान बनाते जा रहे हैं, अब कला जैसे पवित्र और संवेदनशील क्षेत्र को अपना हथियार बना रहे हैँ। इस गंभीर मसले के प्रति चेतना होगा। क्या वास्तविक कलाकार अपनी सृजन की दुनिया में इन तथाकथितों को घुसपैठ करने देना चाहेंगे। सोच का विषय है। इस मसले के प्रति गंभीरतापूर्वक सोच कर कठोर कदम उठाने से ही हम कला की दुनियां की सादगी व वास्तविकता को बनाए रख सकेगें।

शनिवार, 1 मार्च 2014

युवा मूर्तिकार रतन सिंह की सड़क हादसे में मौत


मूमल नेटवर्क, जयपुर। स्क्लपचर वर्ड में तेजी से छाए युवा मूर्तिकार रतन सिंह प्रजापति की पिछले दिनों एक सड़क हादसे में मृत्यु हो गई। वे अब तक 30 बसंत भी नहीं देख पाए थे।
यहां प्राप्त जानकारी के अनुसार हरियाणा में नारनौल के पास भुनवारका गांव निवासी रतन सिंह अपनी मौसेरी बहनों के विवाह में शामिल होने के लिए शेखावाटी क्षेत्र में गए थे। वहां 27 मार्च कि शाम दहेज के सामान के साथ कुछ रिश्तेदार ट्रक पर सवार होकर गोनेदा गांव से रवाना हुए थे। इन्हीं में रतन सिंह भी शामिल थे। खेतड़ी के पास एक मोड़ पर संतुलन बिगडऩे से ट्रक उलट गया। इस हादसे में रतन सिंह सहित 3 युवकों की मौत हो गई। एक अन्य गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसका उपचार चल रहा है।
अपनी कृति 'इनप्रेशट इन नॉलेज' के कारण रतन सिंह देशभर में जाने जाते थे। रतन जयपुर के प्रसिद्ध कलाकार हरिराम कुमावत के साले थे और उन्हीं के सानिध्य में रतन की कला में निखार आया।
कलाकार हरिराम कुमावत का फोन नम्बर है: 09414371238

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

कला बाजार में उम्मीद भरा उत्साह

चार साल की मंदी के बादल छंटे
कला व्यापारियों की नजर से देखा जाए तो 'ग्रेट वर्क' की बाजार में कमी है, जो कुछ निजी संग्राहकों और म्यूजियम से ही खरीदे जा सकते हैं। इन ग्रेट वर्क की कीमतों में आए उछाल को देखते हुए निवेश की दृष्टि से कई नए कला खरीददारों की संख्या बढ़ी है, जो कला बाजार के लिए अच्छे संकेत हैं।

 वर्ष 2014 भारतीय कला बाजार के लिए बहुत बेहतर होने की उम्मीद लेकर आया है। 2013 के अन्त में क्रिस्टीज द्वारा की गई गोयतोंडे की पेंटिंग की ऊंची कीमत की खरीद ने कला बाजार के 2014 के दरवाजे पर आशा और विश्वास भरी दस्तक दी है। वर्ष की शुराआत में ही भारतीय कला नीलामी घर सैफरोन द्वारा किए गए बिजनेस ने इसे पुख्ता बनाया है। कलाकारों, कला व्यापारियों व कला संग्राहकों के लिए यह वर्ष बहुत अच्छा बीतेगा, यह उम्मीद की जा सकती है। इस उम्मीद को लेकर कई नीलामी घरों और कला दीर्घाओं ने खरीद-फरोख्त व नीलामी की योजनाएं तक बना डाली हैं।
फरवरी मध्य की बात करें तो सैफरोन आर्ट ने 30.32 करोड़ रुपए मूल्य की कृतियां बेची है। उसमें 5.75 करोड़ रुपए तो केवल एस.एन. रजा की अकेली उस कृति को मिले थे जो उन्होने 1951 में पेपर पर बनाई थी। किसी पेपर पर बनाई गई भारतीय कलाकार की यह सबसे महंगी कृति के रूप में बिकी।
सैफरोन के फाउण्डर दिनेश वजीरानी के अनुसार रजा की इस कृति को खरीदने के लिए ऑनलाईन और फोन पर लगभग 200 कला संग्रहकों ने सम्पर्क किया था। इस खरीद ने कला बाजार में तेजी के वापस लौटने को स्पष्ट किया है। इसी सोच को सामने रखते हुए सैफरोन ने लगभग चार प्रत्यक्ष बिक्री आयोजनो और लगभग 12 ऑनलाईन बिक्री आयोजनो की योजना बना ली है। जो इसी वर्ष में क्रमवार आयोजित किए जाएंगे।
वैसे कला व्यापारियों की नजर से देखा जाए तो 'ग्रेट वर्क' की बाजार में कमी है, जो कुछ निजी संग्राहकों और म्यूजियम से ही खरीदे जा सकते हैं। इन ग्रेट वर्क की कीमतों में आए उछाल को देखते हुए निवेश की दृष्टि से कई नए कला खरीददारों की संख्या बढ़ी है, जो कला बाजार के लिए अच्छे संकेत हैं।
निवेशकों की बढ़त को देखते हुए कला व्यापारी रीयल एस्टेट की तर्ज पर एंटिक वस्तुओं जैसे पुरानी कारों और चीनी मिट्टी व टेराकोटा के पुराने बर्तनों के साथ अन्य वस्तुओं को बेचने का भी प्लान बना रहे हैं।
फरवरी की बिक्री
सैफरोन ने 5.37 करोड़ रुपए की 70 समकालीन कृतियां बेची गई। इसमें प्रमुख रूप से जी.रवीन्द्र रेड्डी, ठकुराल व टागरा, शिब्बू नेटेसन, जितिश कालट व अंजू डोडिया की कृतियां शामिल हैं। प्रति कृति की बात करें तो 24 लाख से 96 लाख की कृति बिकी।
30.32 करोड़ रुपए की 68 मॉडर्न कलाकृतियां बिकीं। जो इनकी लगाई गई अनुमानित कीमत 23.14 करोड़ रुपए से काफी ज्यादा प्राप्त हुई। इसमें पांच श्रेष्ठ कार्य एस.एच. रजा, एफ.एन. सूजा, राम कुमार और कृष्ण खन्ना के थे। इसमें प्रति कृति कीमत की बात करें तो 1.02 से लेकर 5.75 करोड़ रुपए की कीमत प्राप्त हुई।
सैफरोन के साथ अन्य कला व्यापारियों का यही मानना है कि चार साल की लगातार रही मंदी ने उन्हें तोड़ कर रख दिया था लेकिन वर्ष की अच्छी शुरुआत ने फिर जान फंूकने का काम किया है।
मुबई का एक और नीलामी घर भी मार्च में 91 कलाकृतियां नीलाम करने की तैयारी कर रहा है, उसमें तैयब मेहता, एम.एफ. हुसैन और अमृता शेरगिल जैसे कलाकारों की कृतियां शामिल होंगी।
-गायत्री

 सम्पादकीय...
कचरे से अटता कला बाजार...
कला का मूल रहा है, साधना। जैसे सोना भट्टी में तप-तप कर निखरता है, ठीक वैसे ही कला में निखार भी निरन्तर अभ्यास और साधना से ही संभव हो पाता है। कला के शिखर पर जिन बड़े कलाकारों का नाम गुंजित हो रहा है, वो इसी कला-साधना का ही प्रतिफल हैं।
कहते हैं, शिखर हमेशा खाली रहता है। लेकिन यहां तो शिखर पर आज भी वही नाम हैं, जो कल थे। आज के किसी कलाकार का यह हौसला क्यों नहीं हो पाया कि शिखर पर अपना भी नाम दर्ज करवा पाएं। कारणों पर नजर डालें तो सबसे बड़ा कारण कला को साधना के स्थान पर बाजार बनाने की कलाकारों की प्रवृति का ही नजर आता है।
अपने विद्यार्थी काल से ही सीखने के हिसाब से बनाई गई कृतियों को बाजार में बेचने की प्रवृति बढ़ी है। अपने कला कर्म की कमियों को साधने के बजाय नजरअन्दाज कर हवाई कीमतों के साथ बाजार में प्रस्तुत करना ही एकमात्र लक्ष्य रह गया है। 'बस किसी भी तरहा कृति बिक जाएÓ यह जो कलाकारों का मानस बन रहा है उसन कला के स्तर में भारी गिरावट पैदा की है।
अपनी बनाई कई कलाकृतियों को स्वयं नकारने के बाद किसी अच्छी व परिष्कृत कृति को लोगों के सामने लाने की भावना रहती थी। कलाकारों की यह भावना अब लगभग लोप हो गई है। कला बाजार में बिग ब्रश से लेकर मंझोले कलाकार और विद्यार्थी वर्ग की बनाई कलाकृतियों की भरमार ने मांग व पूर्ति के के संतुलन को बिगाड़ दिया है। मांग के हिसाब से पूर्ति की अधिकता ने जहां एक ओर कला खरीददार के आगे कई विकल्प खड़े किए हैं वहीं भ्रम की स्थिति भी पैदा की है।
एक दौर, जिसमें कला निवेश की स्थिति आई थी, अब असमंजस के कगार पर खड़ा है। कृतियों के ढेर से अटे बाजार में से निवेश की दृष्टि से किसी कृति का चयन करना ही मुश्किल हो चला है। इसका असर बिग ब्रश पर भी पड़ा है। उन तक पहुंचने के रास्ते में कई-कई भ्रामक कृतियों का जाल सा बिछ गया है।
हम यह नहीं कह रहे कि बिग ब्रश माने जाने वाले कलाकारों की कृतियां ही श्रेष्ठ हैं। कई छोटे कलाकारों की कूंची में भी दम है जो मिडिल क्लास की जेब और उनके कला के प्रति आग्रह को संतुष्टि देने में सक्षम है। वहीं विद्यार्थी स्तर पर देखा जाए तो कई ऐसे हैं जिनके पांव पालने में ही नजर आ रहे हैं। ऐसे विद्यार्भी कला फलक के बड़े सितारे के रूप में उबर कर सामने आ सकते हैं। लेकिन इन सब के बावजूद कला साधना को नकारते हुए किसी कारखाने के उत्पाद सी कृतियों से भरे बाजार ने कला खरीददारों को भ्रमित व निराश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। मिथ्या मूल्य निर्धारण ने इसमें कोढ़ पर खाज सी स्थिति उत्पन्न कर दी है।
आज जब 'कला' पूंजी निवेश के महत्वपूर्ण पायदान पर आ खड़ी हुई है, ऐसे में कला के कचरे से अटा बाजार उसे क्या दिशा देगा, यह सोच का विषय है।

क्या अधकचरी कृतियां कला खरीददार की 'निवेश' की भावना को खण्डित कर देगी? यदि ऐसा होता है तो कला निवेश को पुन: स्थापित करने में एक लम्बा समय लग जाएगा जो कला जगत के लिए अभिशाप सिद्ध होगा। इससे बचने के लिए 'कला-नीति' बनाना और सक्षम संस्थाओं द्वारा कढ़ाई से निभाना एक उपाय नजर आ रहा है। इसके साथ ही शौंकिया और साधनाहीन कलाकारों का एक अलग बाजार बनाना, कला विद्यार्थीयों के शिक्षा पूर्ण होने से पहले ही बाजार में कूदने की प्रवृति पर लगाम कसना भी कला बाजार के रूप को बिगडऩे से बचा सकता है।

अब अपनों से अपनी बात 
पाठक ही बताएं..
पिछले दिनों कला विद्यार्थी पाठकों की यह मांग जाहिर हुई है कि 'मूमल' में ताजा समाचारों और कला जगत की गतिविधियों के साथ शैक्षिक पक्ष को भी बढ़ाया जाए। इसके लिए प्रत्येक अंक में किसी न किसी नए या पुराने कलाकार के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाए।
इसके बाद मूमल के संपादक मंडल ने तय किया है कि वर्तमान में उपलब्ध लिमिटेड प्रिंट एरिया में उतने विस्तार से जानकारी संभव नहीं है जितनी विद्यार्थी चाह रहे हैं। इसके लिए कुछ विशेष संस्करण प्रकाशित करने होंगे। इसके बाद उन कलाकारों का चयन भी आसान नहीं जिनके बारे में आप जानकारी चाहते हैं।
ऐसे में अब आप ही बताएं कि आप नए या पुराने किन-किन कलाकारों और कला विधाओं के बारे में जानना चाहते हैं? आप की राय व आवश्यता जानने के बाद ही मूमल संबंधित विषय विशेषज्ञों से सामग्री तैयार कराके आगामी अंकों में इसे प्रकाशित करेगी।
आप अपनी राय हमें एस.एम.एस., ई-मेल या पत्र के जरिए दे सकते हैं। मूमल के ब्लॉग, फेसबुक या ट्वीटर पर इस बारे में कमेंट भी किया जा सकता है। हमें आपकी राय का इंतजार है, क्योकि मूमल पाठकों से संचालित होता है... बाजार से नहीं।

-संपादक

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

Date extended till 03.03.2014.

The post of Editor (Ancient) & Deputy Secretary (A & A), 
Lalit Kala Akademi, New Delhi has been extended till 
03.03.2014.

LALIT KALA AKADEMI 
RABINDRA BHAVAN, NEW DELHI
 The Lalit Kala Akademi an autonomous organization of the Ministry of Culture, Government of
India, invites applications from eligible candidates for the following posts, on deputation basis.
As Per The Official Site of LKA
 1. Editor (Ancient) – one post 
Group ‘A’ in PB-3 in the Pay Band with G.P. of Rs. 15600-39100+7600
plus allowances admissible under the rules to Central Govt. employee.
 Age: The candidate should not have crossed 55 years of age on the last date of receipt of
application.
 Period of Deputation: Initially for one year and can be extended for three years and in
any case will not exceed five years.
 Essential Qualifications:
a) Master’s Degree in History of Art/Art Criticism or an equivalent recognised qualification,
with good command over English, with intimate knowledge of Ancient Art in India and
abroad.
 b) At least 10 years experience of working in a Journal/magazine relating to Ancient Art or
a Newspaper of repute.
 c) Persons belonging to Central/State Govt. or University system, Cultural organisation
having at least five years regular service in the Pay Band with Grade Pay of Rs. 15600-
39100+6600 or ten years service in the Pay Band with Grade Pay of Rs. 15600-39100 + 5400.

 2. Deputy Secretary (Administration & Accounts) – one post 
(Group ‘A’ in PB-3 in the Pay Band with G.P. of Rs. 15600-39100+6600 plus allowances
admissible under the rules to Central Govt. employees.
 Essential Qualifications:
(a) A University degree or an equivalent recognised qualification.
(b) 8 years experience in Accounts and Administration in a senior capacity, preferably in
Government or Government Undertaking or autonomous organizations, following rules
similar to those in Government.
(c) Persons should belong to Central or State Govt. or University system or Cultural
organisations with at least 5 years regular service in the Pay Band with Grade Pay of Rs.
15600-39100+5400 or 8 years service in the Pay Band-2-
 with Grade Pay of Rs. 9300-34800+4800 with University degree and experience in
Administration and Accounts.
 Desirable: Graduate in Commerce with at least 3 years experience of working in an
organisation engaged in the promotion of Visual & Plastic arts and with knowledge of
using computers in work.
 Age: The candidate should not have crossed 50 years of age on the last date of receipt of
applications.
 Period of Deputation: Initially for one year and can be extended for three years and in
any case will not exceed five years.
 The applications complete in all respects, supported with attested copies of certificates
mentioning the full particulars of the post applied for should reach the Secretary I/c., Lalit Kala
Akademi, 35, Ferozeshah Road, Rabindra Bhavan, New Delhi – 110 001 within 30 days from the
date of issue of this advertisement. Applicant should apply through proper channel. Incomplete
application or those found deficient in any manner will not be entertained. The application
should be supported with last 5 years ACR dossiers duly attested.

.ANNEXURE-II 
 FORMAT
 1. Name
2. Date of Birth
3. Permanent Address/Address for Communication
4. Educational Qualifications
5. Particulars of the post held
6. Post held on regular basis (with scale of pay and date of appointment)
7. Nature of appointment to the present post (whether on deputation/ad-hoc basis)
8. Scale of pay of the present post held
9. Date of return from the last ex-cadre post, if any
10. Particulars of past experience
11. Details of experience (in brief)
12. Any other relevant information
13. Official Address
Date:
Place:

 Signature of Applicant

 ANNEXURE-III
 Certificate
 (To be filled by the competent authority forwarding the application)
 1. Certified that the particulars furnished by the candidate have been checked from available
records and found correct.

1. Certified that it has been verified that the candidate is eligible for the post applied for as per
the conditions mentioned above.
 2. No vigilance case is either pending or being contemplated against the candidate. There is
nothing in the ACR dossiers of the candidate which makes him/her ineligible for
consideration for appointment to the post applied for.
 3. Up-to-date ACR dossiers of the candidate are enclosed.

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शनिवार, 25 जनवरी 2014

नेशनल आर्ट वर्कशॉप 3 से 6 फरवरी तक

 मूमल नेटवर्क, जयपुर। प्रदेश के सबसे पुराने कला शिक्षा संस्थान राजस्थान स्कूल आफ आर्ट में तीसरी राष्ट्रीय कला कार्यशाला का आयोजन 3 से 6 फरवरी तक कॉलेज परिसर में किया जाएगा। इसमें देश भर के युवा अपनी कला के तेवर दिखाएंगे। पाठ्यक्रम के अंतिम वर्ष की शिक्षा पा रहे लगभग 60 युवा कलाकार  चित्रकला और एप्लाइड आर्ट के जरिए विभिन्न सामाजिक सरोकारों पर कई पेंटिंग और पोस्टर बनाएंगे। कार्यशाला में तैयार कलाकृतियों को प्रदर्शित भी किया जाएगा।
यह होंगे प्रतिभागी
आर्ट वर्कशॉप के कन्वीनर सुनीत घिल्डियाल ने बताया कि इस कार्यशाला में  लगभग 11 प्रतिष्ठित कालेजों व ललित कला संकाय भाग लेने जा रहे हैं। इनमें फाइन आर्ट संकाय बड़ौदा, कला भवन, शांति निकेतन, बीएचयू वाराणसी का दृश्य कला संकाय, दिल्ली कॉलेज आफ आर्ट, लखनऊ कॉलेज आफ आर्ट, चंडीगढ़ कॉलेज आफ आर्ट, जामिया मिलिया इस्लामिया का ललित कला संकाय, हैदराबाद कालेज आफ आर्ट, चित्रकला परिषद, बंगलौर से ललित कला संकाय, जयपुर के आईसीजी कालेज का ललित कला संकाय, राजस्थान विश्वविद्यालय के ललित कला संकाय के साथ राजस्थान स्कूल आफ आर्ट के विद्यार्थी भाग ले रहे  हैं ।
एक परिचय
राजस्थान स्कूल आफ आर्ट को 1857 में स्थापित किया गया था। कला को शिक्षण के जरिए बढ़ावा देने राजस्थान की सबसे पुरानी संस्था है। यह संस्था गुलाबी नगर के किशनपोल बाजार की एक पुरानी इमारत में स्थित है। इस इमारत की अपना एतिहासिक महत्व है। इस कालेज से शिक्षण प्राप्त कर चुके विद्यार्थी पिछले 150 वर्षों से ना केवल देश अपितु विदेशों में भी आज अपनी कला के दम पर पहचाने जाते हैं।

 नेशनल आर्ट वर्कशॉप 3 से 6 फरवरी तक

सोमवार, 20 जनवरी 2014

National art Exhibition राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी मार्च में

                           राजस्थान के तीन कलाकारों का काम चुना               
मूमल नेटवर्क, नई दिल्ली। 55वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी मार्च महीने के दूसरे सप्ताह तक दिल्ली में शुरू होगी। इस प्रदर्शनी के लिए देशभर के हजारों कलाकारों की कृतियों में से इस बार 172 कलाकृतियां प्रदर्शन के लिए चुनी गई हैं। इनमें राजस्थान के तीन कलाकारों का काम शामिल किया गया है।
राजस्थान से शामिल किए गए तीन कलाकारों में जयपुर के आकाश श्री चंदनराम व इरा टांक तथा उदयपुर की ज्योतिका राठौड़ के नाम हैं। आकाश ने जहां मिक्स मीडिया में 'रिचाार्जिंगÓ शीर्षक से काम किया है वहीं इरा टांक ने कैनवास पर एक्रेलिक से 'बॉन्डिंगÓ शीर्षक से अपने भाव व्यक्त किए हैं। उदयपुर की तेजी से उभर रही कलाकार ज्योतिका राठौड़ ग्राफिक के जरिए उपकरणों में खोई अपनी पहचान खोजते व्यक्ति पर अपनी सोच जाहिर की है।
Era Tak




Jyotika Rathour