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शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

तैयब मेहता की पेंटिंग 'दुर्गा महिषासुर मर्दिनी' को मिले 20 करोड़

तैयब मेहता की  पेंटिंग 'दुर्गा महिषासुर मर्दिनी' को मिले 20 करोड़  
सॉदबी की पहली नीलामी 'बाउंडलैस इंडिया' में हुई नीलाम
अमृता शेरगिल की 'द लिटिल गर्ल इन ब्लू' को मिली रिकार्ड कीमत
मूमल नेटवर्क, मुंबई। तैयब मेहता की प्रसिद्ध पेंटिंग 'दुर्गा महिषासुर मर्दिनी' कल गुरुवार की शाम मुंबई में

सॉदबी की पहली नीलामी 'बाउंडलैस इंडिया' में 29 लाख डॉलर (करीब 20.49 करोड़ रुपये) में नीलाम हो गई है।
सॉदबी के एक अधिकारी ने बताया कि नीलामी के दौरान 79 लाख डॉलर (करीब 55.40 करोड़ रुपये) की कलाकृतियां बेची गयीं। उन्होंने बताया कि 75 प्रतिशत से अधिक पेंटिंग पर उनके अनुमानित मूल्य से ज्यादा की बोली लगाई गयी।
मेहता की पेंटिंग 1993 में उनसे लिये जाने के बाद से इसी निजी कलाकृति संग्रह में रही है। अमृता शेरगिल की 'द लिटिल गर्ल इन ब्लू' के लिए कड़ी स्पर्धा की वजह से इस पेंटिंग की 18.69 करोड़ रुपये की कीमत आंकी गयी जो भारत में किसी कलाकार के लिए रिकार्ड कीमत है। यह दुनियाभर में बिक्री के लिए रखा गया कलाकार का सातवां तेल चित्र है। यह 80 साल से इसी संग्रह में है। इससे पहले शेरगिल की दूसरी कलाकृति भी बेची गयी जो उन्होंने केवल 10 साल की उम्र में कागज पर बनाई थी।
पश्चिम एशिया और भारत के लिए सॉदबी के अध्यक्ष एडवर्ड गिब्स ने कहा कि यह सॉदबी के लिए बहुत महत्वपूर्ण क्षण है। उन्होनें कहा कि आज रात की बिक्री दक्षिण एशियाई बाजार के प्रति सॉदबी की सतत प्रतिबद्धता को दर्शाती है। सॉदबी की भारतीय और दक्षिण एशियाई कला की अंतरराष्ट्रीय प्रमुख यामिनी मेहता ने कहा कि 'आज के परिणाम दक्षिण एशियाई कला बाजार के लिए विश्वास मत की तरह है जहां विभिन्न कलाकारों और विधाओं के बीच नयी ऊंचाइयां हासिल की गयी हैं।
मेहता की पूर्व में बिकी कृतियां
उल्लेखनीय है कि इससे पहले दिवंगत कलाकार तैयब मेहता की एक पेंटिंग अनटाइटल्ड (काली) 26.4 करोड़ रुपये में बिकी थी। बिक्री के मामले यह अब तक की उनकी सबसे महंगी कृति बन गई हुई है। इससे पहले उनकी अनटाइटल्ड (वुमन ऑन रिक्शॉ) 22.99 करोड़ की कीमत के साथ सबसे महंगी कृति थी। 

शनिवार, 17 नवंबर 2018

कलात्मक अन्दाज में रंग और साज का उत्सव

कलात्मक अन्दाज में रंग और साज का उत्सव
ता-ब्लू म्युजिक फेस्ट
-राहुल सेन
होटल आमेर क्लार्क की सबसे ऊंची मंजिल पर बना है रेस्टोरेंट ता-ब्लू। कलात्मकता की सजीवता के बीच लजीज व्यंजनों के स्वाद और सुकून से बिताया गया कुछ समय। ता-ब्लू की रचना कला को प्रदर्शित करने के लिए ही की गई थी। पिछले दिनों म्युजिक फेस्ट के जरिए इसके 15 वर्ष पूर्ण होने की खुशी मनाई गई।
14 से 16 नवम्बर तक हर रात साढे नौ बजे से साढे बारह बजे तक देश-विदेश के कलाकारों ने यहां संगीत की महफिल सजाई। आयोजकों ने हर शाम के निमन्त्रण का अलग-अलग पोस्टर तैयार किया। संगीत की महफिल जहां कानों को सुमधुर एहसास दे रही थी वहीं महफिल का हर पोस्टर आंखों को किसी कलाकृति सा तृप्त कर रहा था। बस यही खासियत रही इस म्यूजिक फेस्ट की जिसमें संगीत की धुनों को पिरोने वालों की खास पेशकश लोगों ने सुनी और पोस्टर की कलात्मकता  लोगों को खींच कर महफिल तक ले आई।
कला की दुनियां में नए अन्दाज की यह पेशकश जरूर आगे भी दोहरायी जाएगी।



सोमवार, 22 अक्टूबर 2018

कई सवालों के बीच शुरू हुआ इंटरनेशनल आर्ट फेस्टिवल जयपुर

कई सवालों के बीच शुरू हुआ 
इंटरनेशनल आर्ट फेस्टिवल जयपुर
मूमल नेटवर्क, जयपुर। इंटरनेशनल आर्ट फेस्टिवल की शुरुआत तय कार्यक्रम के अनुसार सोमवार को हो गई। कलाकारों की भीड़ के बीच फेस्टिवल का उद्घाटन फिल्म कलाकार कंवलजीत और अनुराधा पटेल ने किया। प्रतिष्ठित कलाकार गीता दास द्वारा स्थिति स्पष्ट किए जाने के बाद भी प्रदेश के प्रबुद्ध कला जगत ने बहुत से ऐसे प्रश्र खड़े किए हैं जो अनुत्तरित हैं।
आर्टिस्टरी ग्रुप की ओर से आयोजित फेस्टिवल में रवीन्द्र मंच के बेसमेंट में बनी दीर्घाओं में कलाकारों की कृतियों को प्रदर्शित किया गया है। आयोजकों का दावा है कि फेस्टिवल में 2000 कलाकारों ने भाग लिया है और उनकी कृतियां प्रदर्शित की गई है। एक जानकारी के अनुसार प्रत्येक कलाकार को अपनी कृतियां प्रदर्शित करने के लिए चार वर्गफीट स्थान दिया गया है और इसके बदले तीन हजार रुपए लिए गए हैं।
गीता दास का पक्ष
इस आयोजन के संबंध में आयोजकों के आपसी मनमुटाव के चलते इसकी सफल सार्थकता पर सवाल खड़े किए जा चुके हैं। इस संबंध में मुख्य आयोजक गीता दास ने अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए बताया कि पूर्व में वह कुछ गैर वाजिब लोगों के प्रभाव में आ गई थीं, लेकिन बाद में समय रहते बहुत कुछ सुधार लिया गया।
उन्होंने बताया कि, मनीष अग्रवाल से हमारा जुड़ाव कभी भी नहीं रहा है। उन्होंने अपने साथी राम सिंहल के साथ मिलकर बिना हमारी जानकारी और सहमति के स्वयं को इस फेस्टिवल और हमारे मंच आर्टिस्टरी का सदस्य बताते हुए कलाकारों की बुकिंग करनी शुरू की और बुकिंग के एवज में कई कलाकारों से राशि प्राप्त की। जब हमें इस बात का पता चला तो वरिष्ठ कलाकार चिन्मय मेहता के घर पर उसे बुलाकर बात की और कलाकारों को पैसा लौटाने के लिए कहा। इसके बाद आयोजन से उनका कोई वास्ता नहीं रहा। इस आशय की जानकारी और सूचना हमने कलाकारों को भी दी। अब स्थिति नियंत्रण में है।
दूसरी ओर होच-पोच हुए आयोजन के बीच आवश्यक जानकारियां तक जग-जाहिर नहीं की जा सकी। कोई भी यह बताने की स्थिति में नहीं कि वास्तव में कुल कितने कलाकारों की कितनी कृतियों को प्रदर्शित किया गया है। कलाकारों में बाहर के कितने कलाकार हैं और जयपुर या राजस्थान के कलाकारों की संख्या कितनी हैं? अंतर राष्ट्रीय स्तर के लिए स्थानीय कलाकारों या कला प्रेमियों के क्या विशेष है? और अत: इस आयोजन में कलाकारों के हित को लेकर क्या कुछ नया किया जा रहा है? मुख्य आयोजक गीता दास स्वयं भी ऐसी जरूरी जानकारियां नहीं दे पाईं। उन्होंने यह जरूर कहा कि, इंटरनेशनल आर्ट फेस्टिवल जयपुर का मुख्य उद्देश्य ट्राइबल एरिया में रहने वाले और ग्रामीण कलाकारों को एक सशक्त मंच प्रदान करना है।
अनेक अन्य प्रश्र भी उठे
आयोजन शुरु होने के साथ ही कलाकारों के बीच चली चर्चा का सबसे बड़ा प्रश्र यही था कि, इन दीर्घाओं में 2000 कलाकारों की कृतियां प्रदर्शित होना कहां तक संभव है? अगर केवल 2000 कृतियों के प्रदर्शन की बात भी करें तो क्या वो संभव है? यदि प्रत्येक कलाकार को कृतियां लगाने के लिए जो निर्धारित स्थान दिया गया है,  क्या वह 2000 कृतियों या 2000 कलाकारों का काम प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त है? कलाकारों के बीच चर्चा का विषय यह भी रहा कि आयोजकों के दावे को सही मान लिया जाए तो  प्रति कलाकार वसूली गई 3000 रुपए की फीस के साथ आयोजकों ने लगभग 60 लाख रुपए जमा कर लिए? सवाल कई हैं और उनके गले उतरने लायक उत्तरों की प्रतीक्षा है।
व्यवसाय हो पर सार्थक तो हो
कलाकारों का कहना था कि बिजनेस करना बुरी बात नहीं है, लेकिन क्या आयोजक कलाकारों के लिए वास्तव में बायर्स उपलब्ध करवा कर आयोजन को सार्थक बना पाऐंगे? उनका यह भी कहना था कि, आजकल बाहर के आयोजकों के लिए कला का धंधा कर पैसे बटोरने के लिए जयपुर उपजाऊ जमीन साबित हो रहा है। कलाकारों को ऐसे आयोजनों में सोच-समझ कर शामिल होना चाहिए। क्योकि आयोजक भ्रामक सूचनाओं के साथ कलाकारों को आकर्षित करते हैं और सही तथ्य छुपाते हैं।
(संबंधित फोटो व वीडियो सुधि पाठकों से साभार)

रविवार, 21 अक्टूबर 2018

शुरु हुआ ललित कला अकादमी का नेशनल आर्ट कैम्प

शुरु हुआ ललित कला अकादमी का
नेशनल आर्ट कैम्प
मूमल नेटवर्क, दिल्ली/श्रीनगर। आज से श्रीनगर में ललित कला अकादमी आयोजित नेशनल आर्ट कैम्प की शुरुआत हो रही है। आज शाम चार बजे कैम्प का उद्घाटन होगा।  मास्टर संसारचन्द्र बारू मैमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट के सहयोग से आयोजित इस कैम्प में देश भर के 15 युवा व वरिष्ठ कलाकार हिस्सा ले रहे हैं। चश्मेशाही स्थित जम्मू एण्ड कश्मीर टूरिज्म डवलपमेंट कारपोरेशन परिसर में यह कैम्प 26 अक्टूबर तक चलेगा।
कैम्प में भाग लेने वाले आर्टिस्ट
भास्कर सागर
जावेद इकबाल
जयप्रकाश जगताप
किशोर राय
नौशाद गयूर
नीलाद्री पॉल
नीलेश वेड़े
राहुल ऊशाहरा
रामचन्द्र पोकले
रमेश भोसले
रश्मि सिंह
साहिल ओहरी
संतोष कुमार वर्मा
शफी चमन
शम्भू नाथ गोस्वामी

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2018

द ग्लिम्पसेस ऑफ गुरुकुल

द ग्लिम्पसेस ऑफ गुरुकुल
मूमल नेटवर्क, जयपुर। आईसीए गैलेरी में प्रसिद्ध चित्रकार संजय एन. राउत की एकल प्रदर्शनी शुरु होने जा रही है। कल शनीवार 20 अक्टूबर की शाम 5 बजे आरम्भ होने वाली प्रदर्शनी का समापन 25 अक्टूबर को होगा। राउत को ब्रह्मचारी जीवन व गुरुकुल की जीवन शैली पर पेंटिंग्स रचना पसंद है। संभवत बाल ब्रह्मचारियों के क्रियाकलापों पर आधारित पेंटिंग्स उनकी पहचान बन गई है। इस प्रदर्शनी में भी संजय की गुरुकुल गतिविधियों पर आधारित रियलिस्टक स्टाइल की पेंटिंग्स प्रदर्शित की जाएंगी।

रविवार, 29 जुलाई 2018

राष्ट्रीय कालीदास प्रदर्शनी

राष्ट्रीय कालीदास प्रदर्शनी 
आवेदन की अन्तिम तिथि 30 सितम्बर
कलाकृतियां भेजने की अन्तिम तिथि 2अक्टूबर 
पारम्परिक भारतीय चित्र एवं मूर्तिकला को बढ़ावा देने के उद्देश्य से गठित कालीदास प्रदर्शनी के लिए कालीदास संस्कृत अकादमी द्वारा प्रविष्टियां आमन्त्रित की जा रही हैं। अकादमी में आवेदन भेजने की अन्तिम तिथि 30 सितम्बर है जबकि कृतियां भेजने की अन्तिम तिथि 2 अक्टूबर है।
इस वर्ष का विषय महाकवि कालीदास के प्रसिद्ध नाट्य काव्य मालविकाग्निमित्रम् है। प्रतिभागी इस महाकाव्य के किसी प्रसंग या दृश्य पर आधारित मौलिक व नवीन कृति प्रदर्शनी हेतु भेज सकते हैं।। कृतियों की शैली पारम्परिक या लोक शैली होना आवश्यक है। कलाकृतियां एक गुणा एक मीटर से बड़ी नहीं होनी चाहिएं।
कलाकृतियों में से श्रेष्ठ चयनित पांच कृतियों को प्रति कृति एक-एक लाख रुपये का पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। पुरस्कार वितरण कालीदास समारोह के समापन अवसर पर 25 नवम्बर को किया जाएगा। पुरस्कृत कृतियां अकादमी की सम्पत्ति मानी जाएंगी। उल्लेखनीय है कि अखिल भारतीय कालीदास सम्मान समारोह उज्जैन 19 से 25 नवम्बर तक आयोजित होगा। अधिक जानकारी अकादमी की वेबसाइट www.kalidasacademy.com  पर उपलब्ध है। 

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

जयपुर में इन्टरनेशनल आर्ट फेस्टिवल

इन्टरनेशनल आर्ट फेस्टिवल
22 से 24 अक्टूबर तक जयपुर में
कला प्रतिभाओं के लिए नया अवसर
मूमल नेटवर्क, जयपुर। जयपुर में कला मेलों के सीजन में इस बार कुछ नए आयोजन और जुडऩे वाले हैं।  इन्टरनेशनल आर्ट फेस्टिवल का नाम प्रमुखता से उभर रहा है। इस फेस्टिवल में नेशनल व इंटरनेशनल आर्टिस्टस के साथ युवा प्रतिभाओं को अपनी कला दिखने का अवसर मिलेगा। फेस्टिवल में बेहतरीन काम को प्रोत्साहित करने के लिए पांच हजार से एक लाख रुपए तक के नकद अवार्ड प्रदान किए जाने की बात कही जा रही है। फेस्टिवल में भाग लेने के लिए 3 हजार रुपए एन्ट्री फीस रखी गई है। इसके फार्म इसी सप्ताह उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
मार्केट के गुर भी सिखाएंगे
आयोजन के लिए 22 से 24 अक्टूबर तक रवीन्द्र मंच की कला दीर्घाएं बुक की गई हैं। इसका आयोजन दिल्ली व मुंबई की हाईप्रोफाइल कलाकार व आर्ट प्रमोटर गीता दास कर रही हैं। आयोजकों के अनुसार फस्टिवल के दौरान मास्टर आर्टिस्ट लाइव डेमोस्ट्रेशन देंगे। इस दौरान वो रंग तकनीक व काम को बेहतरीन तरीके से करने के साथ मार्केट के गुर भी सिखाएंगे ताकि आर्टिस्ट अपनी कृतियों से जीवनयापन के लिए अच्छी आय की प्राप्ति कर सके। इस आयोजन का हिस्सा बनने के लिए जुलाई माह के अन्त तक आवेदन स्वीकार किए जाएंगे। चयन कमेटी द्वारा प्राप्त आवेदनों में से श्रेष्ठ कृतियों को शो में शामिल करने के लिए चयन किया जाएगा। प्राप्त आवेदन को कई वर्गों  में बांटा गया है जिसमेंं पेंटिंग, स्कल्पचर्स, पॉटरी,वॉटर कलरवर्क, ड्राइंग, फोटोग्राफी, कैलीग्राफी, ट्रेडिशनल  आर्ट व फोक आर्ट  इत्यिादि शामिल हैं
कई नकद अवार्ड 
फेस्टिवल में भारत के कई प्रांतों के कलाकारों के साथ विदेशी आर्टिस्ट्स की कला देखने का अवसर मिलेगा। राजस्थान की ऐसी प्रतिभाओं को मंच प्रदान किया जाएगा जिन्हेेंं किसी भी कारण से आज तक अपनी प्रतिभा को दुनियां के सामने लाने का अवसर नहीं मिल पाया है। किसी भी आयु वर्ग का आर्टिस्ट इस फेस्टिवल का हिस्सा बन सकता है। हालांकि आयोजन में आर्टिस्ट्स को दो कैटेगरीज  में बांटा गया है जूनियर 30  वर्र्ष तक की आयु वाले और सीनियर्स 30 वर्ष से अधिक की आयु वाले। प्रदर्शित होने वाले सभी कामों में से बेहतरीन कृतियों को प्रोत्साहित व सम्मानित करते हुए विभिन्न श्रेणियों में 5 हजार से लेकर एक लाख रुपए के कई नकद अवार्ड दिए जाएंगे। अवार्ड की राशि सीनियर्स व जूनियर्स के लिए एक समान होगी। आयोजन में राजस्थान की गांव ढाणियों में छुपी हुई प्रतिभाओं को विशेष अवसर दिया जाएगा। ऐसी प्रतिभाओं को विशेष रूप से पुरस्कृत  किया जाएगा जो टेक्निकली साउण्ड नहीं होने के बावजूद उपलब्ध सीमित संसाधनों से ही बेहतरीन कलाकृतियों का निर्माण करते हैं।
 देखें मूमल आर्ट न्यूज पोर्टल: 

बुधवार, 4 जुलाई 2018

Rajasthan-147 साहसी कलाकारों के खुले विचार व सुझाव

साहसी कलाकारों के खुले विचार व सुझाव
सुधि पाठकों की प्रतिक्रिया व समीक्षा संबंधी आलेख के दूसरे भाग में उन कलाकारों के विचार उनके नाम सहित प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी हस्ती खुद बनाई है और उनका मानना है कि वे अकादमी की वैशाखियों के सहारे चलने के पक्षधर नहीं हैं। इसलिए किसी गुडबुक या बैडबुक की चिंता किए बिना उनके विचार के साथ उनका नाम बेखटके दिया जा सकता है। प्रस्तुत हैं कुछ प्रमुख प्रधिनिधि विचार व सुझावं...

प्रदेश के बाहर कार्यरत जाने-माने और व्यस्त कलाकार मोहन जांगीड़ ने समय निकाल कर मूमल को अपने दर्द से अवगत कराया। उन्होंने लिखा कि राजस्थान ललित कला अकादमी के युवा पदाधिकारियों को देखकर लगा था कि अब प्रदेश के कलाकारों का भला जरूर होगा। हालांकि मैं राजस्थान के बाहर काम कर रहा हूं और खुश हूं, लेकिन राजस्थान में पला-बढ़ा हूं, इसलिए वहां के आर्टवर्ड में इतनी अव्यवस्था के बारे में जानकर बहुत दुख हुआ। अकादमी का यह एक अच्छा कदम था, लेकिन चुनाव करते वक्त यह जरूर ध्यान दिया जाना चाहिए था कि जिस तरह भारत की बात करने पर हुसैन, सूजा या रजा का नाम सबसे पहले सामने आता है वैसे ही राजस्थान की बात करने पर कुछ नाम बिना किसी विवाद के सामने आते है। दुख की बात है कि वह नाम व उनके काम नजर नहीं आए। आपके मूमल न्यूज से जन्मभूमि की खबर मिलती रहती है, इसलिए अपना यह दर्द आपसे शेयर कर रहा हूं।

राजनीति की दलदल से ऊपर बेबाक बोलने वाले वरिष्ठ डॉ. रघुनाथ शर्मा ने कहा कि, अकादमियों में मनमानी की दो ठोस वजह नजर आती हैं । पहले अध्यक्ष, सचिव आदि की नियुक्ति मनमाने ढंग से होना, लंबा समय बीत जाने पर नियुक्ति करना। हुक्मरान ने अपना एक शासकीय अंदाज़ बना रखा है। वो अपने इस अंदाज से अप्रत्यक्ष रूप से यह भी संदेश दे देते हैं कि कला - वला हमारी प्राथमिकता में दूर दूर तक नहीं है। इन्हीं के द्वारा तय होने वाले बड़े लोग कुछ तो उस अंदाज को आगे बढाएंगे ही दूसरा, कलाकार स्वयं, जो गुटबाजी के साथ मनमानी करने में भी अब माहिर हो गए हैं, जिस तरह से क्रिएटिविटी में आजादी के पक्षधर है उसी तरह जजिंग करने में, अकादमी की कई अन्य गतिविधियां करवाने में अपने आप को आजाद मानते हैं । न कोई नीति नियम, न वरिष्ठता का खयाल, न किसी की क्रियाशीलता का लिहाज......जैसे डंके की चोट पर कह रहे हो कि क्या कर लोगे हमारा? कुछ वरिष्ठ व पारंगत कलाकारों को चयन करके, भर लो अपने मनचाहे  लोग ।.....आप कुछ कहो तो सैकड़ों तर्क-कुतर्क व बहाने इनकी जुबान पर रहते हैं ।....और  वैसे हर जगह पर स्वयं को संवेदनशील कहलाना पसंद करते हैं ।

कला जगत में अपनी अलग पहचान बना चुके कलाकार नवल सिंह चौहान ने सभी चयनित कलाकारों को हार्दिक बधाई देते हुए कहा है कि कलाकार होने के नाते कुछ बातें जहन में आ ही जाती हैं। जहाँगीर कला दीर्घा में चयनित कलाकारों की सूची थोड़ी और बड़ी हो सकती थी। सूची देखने पर लगा कि कुछ युवा व वरिष्ठ कलाकारों की अनदेखी की गई है। पक्षपात करना ठीक नही है।

पहली बात... चयन का कोई आधार होना चाहिए, नाम के बजाय काम देखकर चयन होना चाहिए। आवाज उठाना हमारा काम है क्योंकि सरकारी संस्थाओं में इस तरह नही चलेगा। कितने कलाकार आज नियमित रेखांकन करते हैं, जो कि सबसे ज्यादा जरूरी है। एक कलाकार को व्यंग्य चित्रण, व्यक्तिचित्रण, रियलस्टिक आर्ट, मॉडर्न आर्ट, सृजनात्मक होना ही चाहिए। चयनित कलाकार स्वयं को परखे, एक ही घिसी-पिटी शैली में बरसों से रंगों का अपमान किए जा रहे हैं।

दूसरी बात... अधिकांश चयनित वे हैं जिन्हें प्रदेश के ज्वलंत कला मुद्दों की पूरी जानकारी तक नहीं है। आपने राजस्थान में नन्हे कला विद्यार्थियों के लिए चल रहे कला आंदोलन को कितना समर्थन व सहयोग दिया? चयनित कलाकारों में से कुछ कलाकार ही इन बातों पर खरे उतर पाएँगे...

अकादमी सरकारी संस्था है। ऐसी मनमानी नहीं चल सकती, सरकार से शिकायत की जा सकती है। ललित कला अकादमी को इस तरह के चयन में पारदर्शिता रखनी होगी। कलाकारों के काम के चयन में उनकी सक्रियता के साथ ही काम का लेवल भी देखा जाना आवश्यक है। दु:ख तब होता है जब वर्षों कला क्षेत्र में काम करने वाले कलाकारों को अनदेखा कर दिया जाता हैं। उम्मीद है भविष्य में सब अच्छा होगा?

जाने-माने शिल्पी हंसराज कुमावत का कहना है कि अकादमी में चाहे कितना ही दूध का धुला इंसान बैठा हो, वो उसी को शामिल करेगा जो उसके खास शिष्य- शिष्याएं और मित्र, रिश्तेदार हो। यह तो बड़े शर्म की बात है कि सेलेक्शन कमेटी के वरिष्ठ सदस्यों ने ने अपना नाम सबसे पहले चुनते हुए उन कलाकारों को दरकिनार रखा जो एक सच्चे साधु की भाँति अपनी कला साधना में लीन हैं। और तो और 100 कलाकारों के सेलेक्शन के बाद 47 ऐसे नाम कहा से प्रकट हो गये जिनका इंडियन कंटेम्परेरी आर्ट में ना कोई खास रेकॉर्ड है और ना ही प्रदेश के कला जगत में उनका कोई योगदान रहा।

ऐसे में यह भी ज्ञात होना चाहिए कि कई ऐसे कलाकार भी हैं जिनको प्रदर्शनी के लिए न्यौता देकर वर्क मंगवाने के बाद भी अकादमी ने उन्हें वापस लौटा दिया। ऐसी शर्मनाक परिस्थितियों के चलते कुछ अनुभवी कलाकारों ने तो अकादमी द्वारा काम मांगे जाने पर साफ  इंकार ही कर दिया, कई कलाकार ऐसे जंजाल से दूर ही अपनी कला साधना में व्यस्त है। राजस्थान ललित कला अकादमी में सटीक रणनीति, पारदर्शिता और एक्सपीरिएंस का अभाव साफ नजर आ रहा है। कलामेल से अब तक घूम फिर के एक ही चहेते चेहरे और कुछ एक ही नाम नजर आ रहे है।

राजस्थान ललित कला अकादमी ने कुछ नया करने के नाम पर कई क्राफ्टमैन और हॉबी कलाकारों को जगह दी। यह अकादमी कलाकारों की है, किसी की बपौती नहीं है। अगर अब भी कलाकारों के प्रति पारदर्शिता नहीं रहीं तो आर टी आई लगाकर जानकारियां लेनी होंगी। शुक्रिया मूमल आपके अखबार में कलाजगत की गतिविधियोंं का सटीक निचोड़ पढऩे को मिलता है, इसमें हमेशा से ही कलाकारों के हित में आवाज उठाई है। जिससे आर्ट पॉलिटिशिएंस और अकादमी सिस्टम कंट्रोल में रहता है।

युवा कलाकार मयंक शर्मा का कहना है कि इस प्रदशनी के लिए कलाकारों को चुनने का कोई आधार नही था। जहाँ एक ओर कलाविद जैसे कलाकार हैं वही ऐसे भी कलाकार चुने गए है जिनको शौकिया कलाकार कह सकते हे जिनको कभी स्टूडेंट अवार्ड भी नही मिला। कलाकारों का चयन ऐसी कमीटी ने किया जिनको कला के बारे में कुछ नही पता पर वो अधिकारी होने के नाते ये हक़ रखते है।

आप कलाकारों की सूचि देखेंगे तो शायद आपको भी आश्चर्य होगा। उदयपुर के एक वरिष्ठ कलाकार का नाम तो दूसरे कलाकारों को बताना पड़ा की ये तो वरिष्ठ कलाकारों में से हे तब उनका चयन किया गया।

जिस प्रकार प्रदर्शनी के कलाकारों की सूचि जारी नही की, उसे आखरी क्षण तक छपाए रखा वैसे ही अकादमी कई कैंप का आयोजन भी करवाती है पर किसी को कानोकान खबर नही होती। जिससे इनके द्वारा चयनित कलाकार जो लगभग सभी कैंप में सामान होते है उनका पता दुसरो को न चले और न कोई विरोध हो। निष्कर्ष यह निकलता है कि, अकादमी अपना काम निर्विरोध कर रही है क्योंकि Óयादातर काम वो गुप्त रूप से करती है।

हितेन्द्र सिंह भाटी ने मूमल को लिखा कि राजस्थान ललित कला अकादमी हम जैसे कलाकारों के साथ हमेशा सौतेला  व्यवहार करती हैं... बारह सोलो शो, जिनमें जहाँगीर आर्ट गैलरी में दो सोलो शामिल हैं... पिछले बीस साल से कला जगत में 'निरंतर कार्यरत हूँ...आइफेक्स  और कैमलिन जैसे अवॉड्र्स पाएं है... देश के नामी कला संग्रहको के पास मेरी पेंटिंग्स है... माना कि ये सब कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है, लेकिन जहाँगीर आर्ट गैलरी मे अकादमी की तरफ  से प्रदर्शित होने वाले इन 147 कलाकारों की लिस्ट में मुझे लगता है मेरा नाम भी होना चाहिए था। आखिर क्यों नहीं है?, जब इस लिस्ट में 20 शौकिया कलाकार हैं और 10 ऐसे, जिनका ब्रश बरसों से सूखा पड़ा है...

माना कि आर्टिस्ट को खुद अपने लिए ऐसे नहीं कहना चाहिए... लेकिन क्यों नहीं कहें... मैं सिर्फ  अपनी बात नहीं कर रहा, राजस्थान से ऐसे कई आर्टिस्ट है, जो इन 147 मे शामिल अनेक कलाकारों से कहीं अधिक बेहतर और निरंतर काम कर रहे हैं। जब अकादमी पूरे राजस्थान की कला को रिप्रजेंट करने जा रही हो तो जिम्मेदारी और बड़ी हो जाती है... सेलेक्शन संवेदनशील होना चाहिए... फेयर होना चाहिए... पारदर्शी होना चाहिए...। यह कोई आत्मश्लाघा नहीं है... ना ही कोई क्षोभ है... सिफऱ्  एक कलाकार की विडंबना है... पीड़ा है...। उल्लेखनीय भाटी ने बाद में अपनी यही बात खुले पत्र के रूप में कला जगत के समक्ष भी रखी।

वीरेन्द्र दायमा ने तेल और तेल की धार देखते के बावजूद साहसपूर्वक कहा कि जो बोलेगा उसे ब्लैक लिस्ट कर दिया जावेगा, इसी कारण से कोई बोलता नही है। जिसका चयन हुआ वो बोलेगा नही जिसका नहीं हुआ वो इन उम्मीद में नहीं बोलेगा की कहीं ब्लैक लिस्ट नहीं हो जांउ। पेंटिग के पीछे नाम देखकर,सगे संबंधी और अपने गुट के कलाकार का चयन करने की परम्परा बनाये रखने में हम ही जिम्मेदार है । कुछ कु-कलाकार अपनी पहुंच का इस्तेमाल कर उच्च पद पर विराजित है और अंतरराष्ट्रीय ख्याती प्राप्त कलाकार उनके पीछे-पीछे चल रहे हैं। कुछ सम्मानित कलाकारों को छोड़कर सभी चयनित कलाकार और चयन करने वाले समय के साथ पाला बदलने वाले और चाटुकारिता की हदें को पार करने वाले है। कई वर्षों से कला क्षेत्र में यही चलता आ रहा है और शायद यही चलेगा।

रेणु बरिवाल ने लिखा, मैने राजस्थान ललित कला अकादमी से किसी भी तरह की आशा छोड़ दी है। मैं अपना काम कर रही हूं क्योंकि यह मेरे लिए जुनून है। मुझे अकादमियों से कुछ भी उम्मीद नहीं है, क्योंकि एक संगठन एक समय में सभी को संतुष्ट नहीं कर सकता है। मुझे पता है कि राजनीति ऐसे संगठनों का हिस्सा है, लेकिन हां यह भी सच है कि वे एक बदलाव ला सकते हैं ... लेकिन कौन परवाह करता है। यही कारण है कि आज भी न केवल राजस्थान बल्कि राष्ट्रीय अकादमी कलाकारों के लिए कुछ भी नहीं कर रही है। तो दोस्तों ... कोई उम्मीद मत करो ...।

निर्मल यादव के अनुसार सब का साथ .....और आपका माध्य्म, हमें साहसी बनाता है और अब भी साहस नहीं करेंगे तो कब करेंगे? आने वाले युवा कलाकर इसी लकीर के फ़क़ीर होते चले जाएंगे। यह कला में भृष्टाचार ही तो है। कहाँ तो यह आनंद देने वाला, भाव विभोर करने वाला अपनी कल्पनाओं को आकर देने वाला माध्यम कला अब बाजारू, और अकादमी अब बंदरबांट का अड्डा हो गयी है। यह देखने वाली बात है, राजस्थान राज्य जो अपनी पौराणिक शैली (मिनीचर आर्ट) के लिए विश्व विख्यात है उसे इतना ज्यादा महत्व नहीं दिया गया उदयपुर से राजाराम जी की की कृति को को ही लगाया गया। एक ही नाम होने से थोड़ी मिस्टेक हो गई। कुल मिला के उदयपुर में कोई भी मिनिचर आर्टिस्ट भी नहीं दिखा अकादमी को। सभी कलाकारों को बहुत बहुत बधाई।

गीतांजलि वर्मा ने राजस्थान 147 का कैटलॉग शेयर करने के लिए मूमल को धन्यवाद देते हुए कहा कि पूरा कैटलॉग देखने पर बउ़ी खुशी हुई कि, कुछ कलाकारों के काम राजस्थान को बहुत अच्छे से रिप्रेजेंट कर रहे हैं। जिनके नाम सलेक्ट किए जाने पर किसी को कोई संशय नहीं होगा। क्योंकि यह राजस्थान के प्रथम श्रेणी के कलाकार रहे हैं। किन्तु कुछ कलाकार जिन्हें अब तक कला की पहचान भी नहीं हुई है। जिन्होंने एकेडमिक वर्क की परिभाषा ही बदल दी। जो दूसरे कलाकारों के वर्क की कॉपी करके ही तारीफ  पाते रहे हैं, उनको भी राजस्थान के प्रमुख कलाकारों में शामिल कर लिया गया। इस बात से बड़ा अफसोस हुआ। ...और इससे भी दुखद बात यह है कि राजस्थान के वो कलाकार जो कलाविद् हैं, और जो कलाकार वाकई कला के मर्म को समझते हैं, उनके काम को ऐसे कलाकारों के काम के साथ प्रदर्शित किया।

क्या ललित कला अकादमी इसके लिए जिम्मेदार नहीं कि जब राजस्थान को रिप्रजेंट करना था तो क्यों नहीं ईमानदारी से श्रेष्ठ कलाकारों को चयनित किया गया? क्या इस कला प्रदर्शनी का उद्देश्य मात्र भीड़ इक्कठी करना था या कि राजस्थान का नाम बढ़ाना? क्या चयन समिति इतनी अनजान और गैरजिम्मेदार थी कि उन्हें यह भी ज्ञात नहीं रहा कि यह प्रदर्शनी राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर राजस्थान की क्या छवि बनाएगी? जिन कलाकारों का इस एग्जीबिशन के लिए चयन नहीं हुआ, उनके काम की समीक्षा तो वो करते हैं, किन्तु क्या कभी राजस्थान ललित कला अकादमी अपने कार्यों की समीक्षा करके संतुष्ट हो पाती है, या उसकी कोई जवाबदेही भी बनती है?

कुलदीप भार्गव कहते हैं, राज्य के कई एक से बढ़कर एक कलाकार वंचित रह गए। यही तो इस देश की खूबी है हर जगह भाई भतीजावाद चल रहा है। प्रतिभाओं की कोई कद्र नहीं है। भले ही काम के नाम पर कुछ भी न हो, फिर भी भाईबंदों का चयन पक्का होता है। एक बात कहना चाहूँगा, जब गुरु ही द्रोणाचार्य हों तो अर्जुन ही आगे बढ़ेगा एकलव्य तो गुमनामियों में ही खोकर रहना है।

दिलीप कुमार डामोर का मानना है कि अकादमी को चयन का क्राइट एरिया भी रखना चाहिए था। उसी से कई अयोग्य लोग लिस्ट से बाहर हो जाते। वैसे राजनीति ने कला, संस्कृति, कलाकार, राजस्थान, समृद्ध भारत व विश्व को खोखला करने मे कोई कसर नहीं छोड़ रखी हैं और सदियों से भी यही किया है... अकादमी में भी दमदार व लायक कलाकारों  नजरअंदाज कर दिया है...। अब भी समय रहते सुधारने की जरूरत है...।

दुर्गेश अटल कहते हैं, अब ललित कला अकादमी से कभी कोई उम्मीद नहीं रही। बाकी किस आधार पर सलेक्शन हुआ है सबको पता है ? कलाकार की मेहनत और उसकी कला ही उसको पहचान दिलाती है । ललित कला अकादमी के अधिकारी कितना भी करें वह ऐसे किसी को कलाकार नहीं बना सकते।

हर्षित वैष्णव ने लिखा, मुझे तो समझ नहीं आया किस आधार पर कलाकारों का चयन किया गया है? उनकी कृति के आधार पर या उन की उपलब्धियों के आधार पर। दोनों स्थिति में कई गलतियां हुई हैं। कई कलाकार थे, जिनका नाम होना चाहिए, जिनके उत्कृष्ट कार्य भी हैं और उपलब्धियां भी। जबकि, जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं फिर भी वे इस प्रदर्शनी का हिस्सा बने।

कमल बक्क्षी कहते हैं वर्षों से कला के लिए समर्पित वरिष्ठ कलाकारों की अनदेखी की गई है। जिन लोगों का कला से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं रहा उनका चयन किस आधार पर किया गया? यह शर्मनाक है।

कब्बू राठौड़ का विचार है कि जब संगीत क्षेत्र के लोग ही ललित कला के बॉस बन गए तो उम्मीद क्या करें? इसका मुझे व अन्य वरिष्ठ चित्रकारों को खेद है। ललित कला अकादमी को अपनी छवि सुधारनी होगी।

मनोज कुमार यादव के मुताबिक यदि आपका गॉड फ़ादर नहीं है तो आप न तो पारम्परिक न आधुनिक... आप अव्वल कलाकार हो ही नहीं। किसी कोने में बैठकर कूँची चलाते रहिये कोई नहीं पूछेगा ।

डॉ. रीता प्रताप का कहना है कि, अकादमी में आज भी मनमानी चल रही है। ....पेंटिंग इंटरनेशनल, नेशनल, स्टेट सभी में सलेक्शन हुआ है। पर एक्जीबिशन में इंवायट नहीं किया गया।

त्रिलोक श्रीमाली का मानना है कि अकादमी स्तर का प्रदर्शन नहीं हो पाया एवं चयन प्रक्रिया में भी वही पुरानी लिस्ट। कुछ हटकर चयन एवं प्रदर्शन की आवश्यकता है।

रवि माइकल ने कला मेला पुरस्कार विवाद के बाद अकादमी के आयोजन को ले कर एक और विवाद पर अपनी चिंता व्यक्त की।

परमेश्वर आर्टिस्ट ने कहा, हर जगह कला के नाम पर खेल खेला जा रहा है।

अक्षय मुदगल ने कहा, न्यू टैलेंट को ज्यादा से ज्यादा मौका देना चाहिए। एक बार से ज्यादा किसी का वर्क सलेक्ट नहीं होना चाहिए। और चयनित काम का कैटलॉग सोशल साइट पर अपलोड होना चाहिए।

लाखन सिंह जाट का मानना है कि भाई भतीजावाद और यारी दोस्ती के आधार पर चयन हुआ है।

देवराज बैरवा का मानना है कि वैसे तो पब्लिक सब जानती है..... पर मैं नहीं जानता कि पेंटिंग सिलेक्ट करवाने के लिए किसके पास जाएं...... ओह आर्ट पॉलिटिक्स।

डीके आजाद ने बस इतना ही कहा कि राजनीतिक रूप से प्रेरित ऐसी कला प्रदर्शनी भाड़ में जाए।