रविवार, 14 अक्टूबर 2012

आखिरकार साखलकर को प्रतिष्ठित 'प्रज्ञा' पुरस्कार की घोषणा

मूमल का फरवरी दिव्तीय अंक
जयपुर, मूमल नेटवर्क। आखिरकार राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अजमेर के वयोवृद्घ (94 वर्षीय) चित्रकार, लेखक व साहित्यकार रत्नाकर विनायक साखलकर को प्रतिष्ठित लेखक के रूप में 'प्रज्ञा' पुरस्कार देने की घोषणा की है। यह सम्मान हिन्दी ग्रंथ अकादमी की ओर से दिया जाता है। इन दिनों अत्यधिक आयु, शारीरिक दुर्बलता और कम सुनने के कारण साखलकर दादा शैया पर है। 
आज (14 अक्टूबर 2012) को सुबह वे सर्दी व कफ से परेशान थे, डाक्टर ने उन्हें दवा का इन्जेक्शन दिया। उसके बाद से वे अधोर अचेत से सो रहे हैं। उन्हें इस बात का कोई ज्ञान नहीं है कि उन्हें सम्मानित किया जा रहा है। 94 वर्षीय साखलकर को शनिवार प्रात: उनके आदर्शनगर स्थिति निवास स्थान पर उनकी पुत्री श्रुति व पुत्र सचिन साखलकर के माध्यम से इस पुरस्कार के बारे में बताने का प्रयास किया गया। मूमल को मिली जानकारी के अनुसार पुरस्कार की घोषणा के बाद उन्हें सूचना देने गए जिला प्रशासन के अधिकारियों ने उनकी स्थिति की जानकारी अकादमी और अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी है। इसके बाद आनन-फानन में उन्हें कल 15 अक्टूबर को उनकी शैया तक जाकर सम्मानित करने का कार्यक्रम निधारित किया गया।
सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक
मुख्यमंत्री ने हिन्दी ग्रंथ अकादमी की ओर से प्रकाशित साखलकर की लोकप्रिय पुस्तक 'आधुनिक चित्रकला का इतिहास' के लिए अकादमी की ओर से यह पुरस्कार देने की घोषणा की है। पुरस्कार के रूप में साखलकर को 51 हजार रुपये की नकद राशि तथा स्मृति चिन्ह प्रदान किया जायेगा।
मुख्यमंत्री निवास से वयोवृद्घ लेखक को पुरस्कृत करने की जानकारी जिला कलक्टर वैभव गालरिया को 13 अक्टूबर 2012 को दी गई। इसके बाद अतिरिक्त कलक्टर शहर जे.के.पुरोहित व सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के सहायक निदेशक प्यारे मोहन त्रिपाठी ने साखलकर के आदर्शनगर स्थित निवास स्थान पर पहुंच कर परिवारजनों को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा उन्हें सम्मानित करने की घोषणा के बारे में जानकारी दी।
सर्वाधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार
राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी के अध्यक्ष आर.डी.सैनी ने बताया कि 'प्रज्ञा' पुरस्कार अकादमी का सर्वाधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार है, जो प्रतिष्ठित लेखक को उनकी पुस्तिक के 15 संस्करण प्रकाशित हो जाने पर प्रदान किया जाता है। रत्नाकर विनायक साखलकर ऐसे ही सर्वाधिक प्रतिष्ठित लेखक हैं, जिनकी पुस्तक ''आधुनिक चित्रकला का इतिहास'' के 15 संस्करण अकादमी द्वारा प्रकाशित किये गये हंै।
सैनी ने बताया कि साखलकर एक मात्र ऐसे लेखक हैं, जिन्होंने चित्रकला विषय पर शुद्घ हिन्दी में रोचक तरीके से पुस्तकें लिखीं और उनकी पुस्तक ''आधुनिक चित्रकला का इतिहास'' अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली पुस्तक है। साखलकर की चित्रकला पर लिखी गई पुस्तकों के प्रकाशन के बाद ही ललित कला के क्षेत्र में पुस्तकें पढ़ी जाने लगी है। अकादमी द्वारा साखलकर की चार पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है।
रत्नाकर विनायक साखलकर 1954 में अजमेर आये तथा डी.ए.वी. कॉलेज में चित्रकला के विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाला। चित्रकला के एम.ए. के पाठ्यक्रम के निर्धारण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्होंने पूना के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आटर््स से स्नातक तथा स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की।
मूमल इंम्पेक्ट
मूमल ने इसी साल फरवरी द्वितीय अंक को साखलकर दादा को समर्पित करते हुए उनके बारे में विस्तार से जानकारी प्रकाशित की थी। उसी में प्रमुखता से यह उल्लेख भी किया था कि पिछले साल इनकी पुस्तक की सर्वाधिक लोकप्रियता को देखते हुए राजस्थान ग्रन्थ अकादमी के नियमानुसार साखलकर जी को सम्मानित किए जाने का प्रस्ताव बना था। पुरस्कार और सम्मानों से दूर रहने के अपने स्वभाव के अनुसार पहले साखलकर दादा यह सम्मान भी लेने को तैयार नहीं थे। बाद में अकादमी के अधिकारियों ने इनके परिजनों से सम्पर्क कर बात बनाई तो दादा ने अपने स्वभाव के विपरीत इसके लिए स्वीकृति दे दी।
लेकिन, इसके बाद वह हुआ जिससे वयोवृद्ध कलाविद और उनके परिजन दोनों बुरी तरह आहत हुए। सम्मान का कार्यक्रम कहीं फाइलों में ऐसा अटका कि सन् 2011 में पहले जुलाई फिर अगस्त और उसके बाद हर महीने अगले महिने पर बात टलती रही। आखिर साखलकर दादा के परिजनों ने आस छोड़ दी। आखिर फरवरी के अंक में मूमल ने इस मुद्दे को फिर उठाया और यह आशंका भी व्यक्त की कि सरकार अगर समय रहते सम्मान नहीं कर सकी तो हो सकता है बाद में काफी देर हो जाए। इसके बावजूद अकादमी के अधिकारियों को सम्मान किए जाने के कार्यक्रम को क्रियांवित करने में आठ महीने का वक्त और लग गया।

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे...

तोबे एकला चोलो रे ........

कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर, एक व्यक्ति का नहीं एक युग और एक संस्था का नाम है। कविगुरु का ये गीत केवल एक गीत ही नहीं बल्कि जीवन दर्शन है। गाँधी जी इसी दर्शन के सहारे साम्प्रदायिकता के खिलाफ अकेले खड़े हो गए थे। इस गीत में सार्थक आत्मविश्वास से भरे जीवन का दर्शन होता है। ...और इस जीवन दर्शन से प्रेरणा प्राप्त होती है...। एकला चलो रे ...अंतत: कामयाबी और मानसिक संतुष्टि का दूसरा नाम है।
इसका अनुपालन हमें हर स्थिति में करना चाहिए। हमें हमेशा सबकेसाथ की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हम न तो सभी को प्रसन्न रख पाएंगे और न ही सभी को अपने साथ चलने के लिए प्रेरित कर पाएंगे। इस आस में हम आगे बढऩे के बजाए रुके रहें तो यह जीवन की सार्थकता की आहुति देने के समान होगा। यह हमारी मानसिक निर्बलता का परिचायक ही होगा।
इस गीत का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि हम सबका विरोध करें। न ही यह हमें प्रेरित करता है कि हम सबके विपरीत चलें। इसका अर्थ तो सिफऱ्  यह है कि हम अपनी अंतरात्मा की आवाज़ का अनुपालन करें - चाहे इसमें हमारा कोई साथ दे या ना दे। मैंने अक्सर महसूस किया है कि लोग हालात में सुधार तो चाहते हैं पर इसके लिए कोई साथ नहीं देता। तो क्या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना उचित है? इससे तो अच्छा है कि हम अपने निर्धारित मार्ग पर अकेले चलते रहें। इतिहास गवाह है कि ऐसे लोग ही मानवता के पथ-प्रदर्शक होते हैं जो एकला चलने में विश्वास रखते हैं।
आज एक लक्ष्य को लेकर अकेले चलते व्यक्ति को भले ही कई गुटों का साथ न मिले, भले ही उसका अनादर हो, भले ही भ्रटाचार में लिप्त लोग उसे महत्वहीन बता कर अपना बचाव करने में सफल होते हों, भले ही उसके विचारों और लेखन को गढ़ी हुई कहानियां बता कर बचने का प्रयत्न हो, भले ही अकेले चलते व्यक्ति को हंसी-मजाक का पात्र बनाकर लोग अपने चरित्र पर पर्दा डालने का जतन करते रहें, लेकिन क्या ऐसा लम्बे समय तक चल पाएगा? एक दिन समय भी बदलेगा और समाज भी.... एक दिन कोई अकेली युवा कूंची सब पुराने और कृत्रिम रंग मिटा कर कला जगत के नए कैनवास पर सच्चे रंग बिखेर देगी...और तब चल पड़ेंगे कोटि पग उसी ओर...।

एकला चलो रे...    (मूल बांग्ला गीत)
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।
तबे एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे!

यदि केऊ कथा ना कोय, ओरे, ओरे, ओ अभागा,
यदि सबाई थाके मुख फिराय, सबाई करे भय-
तबे परान खुले
ओ, तुई मुख फुटे तोर मनेर कथा एकला बोलो रे!

यदि सबाई फिरे जाय, ओरे, ओरे, ओ अभागा,
यदि गहन पथे जाबार काले केऊ फिरे न पाय-
तबे पथेर काँटा
ओ, तुई रक्तमाला चरन तले एकला दोलो रे!

यदि आलो ना घरे, ओरे, ओरे, ओ अभागा-
यदि झोड़ बादले आधार राते दुयार देय धरे-
तबे वज्रानले
आपुन बुकेर पांजर जालिये निये एकला जलो रे!

 एकला चलो रे.....(हिंदी अनुवाद)
तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला रे
   
यदि कोई भी ना बोले ओरे ओ रे ओ अभागे
यदि सभी मुख मोड़ रहे... सब डरा करें
तब प्राण प्रण से
मन की बात बोल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो ओ रे ओ अभागे
गहन पथ पर चलते हुए सब लौटते जाएं
तब पथ के कांटे
लहू लोहित पद दलित कर चल अकेला रे

यदि दिया ना जले ओरे ओ रे ओ अभागे
यदि बदरी आंधी रात में सब द्वार बंद करें
तब शिखा वज्र से
ओ तू हृदय पंजर जला और जल अकेला रे
तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला रे...

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

राजस्थान ललित कला अकादमी अध्यक्ष का एक वर्ष

'मूमल' सर्वेक्षण (06/12)
राजस्थान ललित कला अकादमी
अध्यक्ष प्रो. भवानी शंकर शर्मा के कार्यकाल का एक वर्ष
राजस्थान ललित कला अकादमी का अध्यक्ष पद संभालने के बाद प्रो. भवानी शंकर शर्मा को अगले महीने एक वर्ष पूरा होने जा रहा है। इस अवसर पर मूमल अकादमी के काम-काज की एक रिपोर्ट प्रकाशित करने जा रहा है। रिपोर्ट निष्पक्ष हो, इसके लिए हमें आपका सहयोग चाहिए। कृपया निम्न तथ्यों को पढ़ कर अपनी राय दें।
अध्यक्ष पद ग्रहण करने के बाद प्रो. भवानी शंकर शर्मा ने जो कुछ कहा था उसके अनुसार... अकादमी द्वारा संपादित किए जाने वाले नियमित कार्यों का और बेहतर संचालन होना था। अकादमी की बंद पड़ी गतिविधियों को चालू कराना था तथा अनेक नए कार्य शुरू होने थे।
ये खास बातें कही गई थीं...
- अकादमी का फंड कम है, उसे बढ़ाने का उपाय करेंगे।
- अकादमी में स्टाफ की बेहद कमी है। हालात सुधारेंगे।
- अकादमी का काम-काज सुस्त है, उसे गति दी जाएगी।
- अकादमी की गतिविधियां नियमित व समयबद्ध करेंगे।
- छात्रों के कार्य का प्रदर्शन कायदे से कराएंगे।
- अन्य अकादमियों व संस्थाओं से तालमेल बढ़ाएंगे।
- जरूरतमंद कलाकारों की मदद के प्रयास बढ़ाएंगे।
- जयपुर से बाहर भी कार्यक्रम आयोजित करेंगे।
- अकादमी के दफतरी काम-काज में जरूरी बदलाव लाएंगे।
- युवा वर्ग की गलतफहमियां दूर करेंगे।
- कला क्षेत्र में वरिष्ठ और कनिष्ठ के बीच की दूरी कम करेंगे।
- राज्य से बाहर प्रदर्शन के लिए कलाकारों की सहायता राशि को बढ़ाएगें। 
- युवा वर्ग को जोडऩे के लिए अकादमी कॉलेजों में जाएगी।
- अकादमी का डिजीटल विकास करेंगे।
- वेबसाइट से नए-पुराने सभी कलाकारों को जोड़ेगे।
- आर्ट फिल्में बनाएंगे।
- डाक्युमेंटेशन करेंगे।
- कलाकारों का विवरण एक स्थान पर उपलब्ध हो ऐसी व्यवस्था करेंगे।
- नई मोबाइल वैन की व्यवस्था की जाएगी।
- 'आकृतिÓ पत्रिका को अब और बेहतर तरीके से प्रकाशित करेंगे।
अब आप मूल्यांकन करें और बताएं कि किस क्षेत्र में कितने अंक दिए जाने चाहिए?         

  प्रत्येक प्रश्र का  पूर्णांक: 10

प्रश्र- 1 क्या अकादमी अध्यक्ष द्वारा किए गए वादे पूरे हुए?        प्राप्तांक.......

प्रश्र- 2 क्या अकादमी के कार्यों का संचालन और बेहतर हुआ?        प्राप्तांक.......

प्रश्र- 3 क्या अकादमी की बंद पड़ी गतिविधियां चालू हुईं?        प्राप्तांक.......

प्रश्र- 4 क्या अकादमी में कोई नया कार्य शुरू हुआ?            प्राप्तांक.......

प्रश्र- 5 कुल मिलाकर अध्यक्ष अब तक कितने सफल हैं?        प्राप्तांक.......

अपनी राय के लिए आप केवल प्रश्र संख्या और उसके लिए आपके द्वारा दिए गए नम्बर (marks) लिख कर भी  हमें भेज सकते हैं।
इसके लिए आप मूमल के ई-मेल का उपयोग कर सकते हैं।  moomalnews.gmail.com
फेसबुक पर आकर अपनी राय आसानी से बता सकते हैं।
 http://facebook.com/moomalnews
मूमल के फोन पर एसएमएस कर सकते हैं।
 99284 87677
यहीं मूमल के इस ब्लाग पर खुली टिप्पणी लिख सकते हैं।
राज. ललित कला अकादमी के बारे में आप चाहें तो अपनी राय विस्तार से भी व्यक्त कर सकते हैं... बस लिख डालिए और डाल दीजिए हमारी ई-मेल पर।
धन्यवाद
आपकी
मूमल  
    




शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

जयपुर में आर्ट व पेंटिंग शो

19 से 21 अक्टूबर तक

 जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में भीलवाड़ा (राजस्थान ) की आर्टो फिल आर्ट गैलेरी द्वारा आर्ट व पेंटिंग शो का आयोजन किया जा रहा है। 19 से 21 अक्टूबर तक चलने वाले इस तीन दिवसीय शो में पारम्परिक व आधुनिक कलाकृतियों का प्रदर्शन किया जाएगा।
संस्था की डायरेक्टर व चित्रकार वंदना दरक ने बताया कि इस शो में भीलवाड़ा के साथ उदयपुर, जयपुर, जोधपुर, भोपाल, अहमदाबाद व रायपुर के कई जाने-माने आर्टिस्ट भाग लेंगे। जयपुर के बाद यह शो दिल्ली और फिर अहमदाबाद में भी आयोजित किया जाएगा। आयोजकों के अनुसार अभी शो की प्रविष्ठियां जारी हैं, कोई आर्टिस्ट इसमें भाग लेना चाहे तो उसे संस्था के फोन नम्बर: 9414011175 पर सम्पर्क करना चाहिए।

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

कला शिक्षा के लिए अनोखा धरना

  पहली अक्तूबर से जयपुर में होगा 

मूमल नेटवर्क जयपुर। कला शिक्षकों की भर्ती के लिए चल रही जद्दोजहद के चलते अब कलाकारों ने अपनी बात जग जाहिर करने के लिए अनोखा तरीका अपनाया है। इस क्रम में कलाकारों ने जयपुर स्थित शिक्षा संकुल के बाहर बड़े स्तर पर धरने व प्रदर्शन का आयोजन रखा है। इसमें खास बात यह है कि पहली अक्टूबर 2012 से शुरू होने वाले इस आंदोलन के दौरान कलाकार अपनी कला का सार्वजनिक प्रदर्शन भी करते रहेंगे। यह सब 15 अक्टूबर तक चलने की संभावना है।
राजस्थान बेरोजगार चित्रकला अभ्यर्थी संगठन सचिव महेश कुमार गुर्जर ने बताया कि शिक्षा विभाग में कला शिक्षकों की भर्ती पिछले 20 सालों से बंद पड़ी है। इसे फिर से शुरू कराने के लिए पूरे प्रदेश के कला अभ्यर्थी इस आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। इनमें चित्रकला, मूर्तिकला और संगीत क्षेत्र के अभ्यर्थी एक साथ अपनी बात शिक्षा विभाग और आमजन के सामने रखेंगे। गुर्जर के अनुसार प्रदेशभर में उनके सम्पर्क लगातार बने हुए हैं और ताजा स्थिति के आधार पर यह कहा जा सकता है कि एक पखवाड़े तक चलने वाले आंदोलन में लगभग 500 अभ्यर्थियों की सक्रीय भागीदारी होगी।
संगठन के उपाध्यक्ष झाबरमल वर्मा के अनुसार राजस्थान में पिछले 20 सालों से सरकारी विद्यालयों में कला शिक्षा पाठ्यक्रम के साथ भेदभावपूर्ण नीति अपनाई जा रही है। इस विषय के लाखों बच्चों के साथ खिलवाड़ हो रहा है। उन्हे इस विषय की शिक्षा वे शिक्षक दे रहे हैं जिनके पास चित्रकला की कोई डिग्री नहीं है।
कोटा से मूमल प्रतिनिधि विजेन्द्र कुमार वर्मा ने बताया कि कला शिक्षकों की भर्ती की मांग को लेकर एक प्रतिनिधि मंडल ने कोटा, बूंदी, बारां ओर झालावाड़ के जिला कलक्टर्स को ज्ञापन दिए हैं। जयपुर में होने वाले आंदोलन में भाग लेने के लिए कोटा से अभ्यर्थी कलाकारों का एक दल आ रहा है।
उदयपुर से मूमल संवाददाता के अनुसार वहां इस आंदोलन से जुड़े लोग फिलहाल सुस्त हैं। जयपुर से अभ्यर्थी संगठन के पदाधिकारियों ने उदयपुर के लिए कला अभ्यर्थी शरद भारद्वाज को जिम्मेदारी सौपी थी , लेकिन अब वहां व्यक्ति बदला जा रहा है।

फेसबुक पर व्यापक चर्चा
कलाकार नवलसिंह चौहान ने इस आंदोलन के लिए 'फेसबुकÓ पर अभियान छेड़ रखा है। उनके अभियान को कला जगत में बेहतर समर्थन मिल रहा है। चौहान के प्रयासों से जो सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उभरा है वह यह कि आम और खास सभी कलाकारों के साथ आमजन को भी यह स्पस्ट हो रहा है कि राजस्थान के शिक्षा विभाग  में कितनी धांधली चल रही है? विभाग के सभी विद्यालयों में जो बच्चों को जो शिक्षक चित्रकला विषय को ज्ञान दे रहे हैं उनके पास चित्रकला विषय की कोई उपाधि नहीं है। दूसरी और जिनके पास चित्रकला विषय में स्नातक उपाधियां है वे स्लेट, नेट, में प्रयास कर रहे हैं। बहुत से पी.एच.डी. कर के टाइमपास कर रहे हैं। बहुत से मामलों में कला अभ्यर्थी केवीएस, एनवीएस और डीएसएसएसबी में जॉब तलाश रहे हैं।
फेसबुक में इस विषय पर अनेक रोचक टिप्पणियां भी सामने आ रही हैं।
एक कलाकार ने लिखा है ' वैसे तो ये कला अभ्यर्थी विभिन्न शहरों में आयोजित होने वाले कला मेलों मेंं भाग लेने के लिए अपने खर्चे पर जाते रहते हैं और रोजगार दिलाने के होने वाले इस आंदोलन में आने के लिए अगर-मगर कर रहें हैं।
एक अन्य टिप्पणी में लिखा है कि 'अभी तो इसे कोई तव्वजों नहीं दे रहे हैं, लेकिन जब कला के कॉलेज व्याख्याता और स्कूली व्याख्याता के लिए सैकेंड ग्रेड की भर्ती खुलेगी तो सबसे पहले वही कला अभ्यर्थी फार्म भरने के लिए दौड़ेंगे जो अभी साथ नहीं दे रहे हैं।
विधानसभा सत्र से भी उम्मीद
आदोलन के आयोजकों को 10 अक्टूबर से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र से भी काफी उम्मीद हैं। विधायक राजेन्द्र सिंह राठौड़ ने उन्हें विश्वास दिलाया है कि वे विधानसभा में बेरोजगार चित्रकला अभ्यर्थियों का सवाल प्रमुखता से उठाएगें।

सोमवार, 24 सितंबर 2012

LALIT KALA AKADAMI

राजधानी की ललित कला अकादमी में इनदिनों धमासान मचा हुआ है। अकादमी से जुड़े पदाधिकारी और सदस्य कला के प्रति अपने निर्धारित कार्य और उद्देश्यों को भूलकर आपसी छीछालेदर और फजीती में लगे हैं। सभी एक-दूसरे के खिलाफ अपने अधिकारों का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में बात जांच समितियों और अदालती मामलों तक पहुंची हुई है। चिंता का विषय यह भी है कि राजधानी से निकल कर यह वायरस राज्यों की अकादमियों तक भी पहुंच रहे हैं फिलहाल आपके सामने पेश है राजधानी की ललित कला अकादमी में चल रही काजगुजारियों की एक बानगी।  (सं.)

ललित कला अकादमी में धमासान

मूमल नेटवर्क, नई दिल्ली। राजधानी की ललित कला अकादमी में अभी दो प्रमुख गुट सक्रीय हैं। एक गुट उपाध्यक्ष के. आर. सुब्बन्ना और सचिव सुधाकर शर्मा का बताया जा रहा है, जबकि दूसरा अध्यक्ष अशोक वाजपेयी के साथ खड़े लोगों का बन गया है। अपने-अपने दाव लगने पर दोनों एक दूसरे को ऐसी पटखनी दे रहे हैं कि अकादमी में दर्शक बने लोग माहौल के मुताबिक आह या वाह करते हैं।
आरोनों से धिरे सचिव
राजधानी के सूत्रों की बात सही मानी जाए तो वर्तमान में विभिन्न शिकायतों के बाद आरोनों से धिरे सचिव सुधाकर शर्मा अनियमितताओं के दोषी पाये गये है। उपाध्यक्ष के. आर. सुब्बन्ना के द्वारा किये गए आचरण संहिता के उलन्घन पर अनुशासनिक समिति गठित है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के ओ. एस. डी. देवरतन शर्मा को पूर्व अध्यक्ष ने सदस्यता से वंचित कर दिया थाए बावजूद इसके ये अकादमी में पूरी तरह सक्रीय है। सूत्रों के अनुसार ये लोग आज अकादमी के तथा कलाकारों के भाग्यविधाता बने हुए हैं। अकादमी में अनियमितता करने वालों का बोलबाला हो गया है। ये सभी अकादमी के कार्यकारिणी समिति के सदस्य हैं। इनकी अनियमितताओं के खिलाफ जिसने भी आवाज बुलंद की उन पर अकादमी की गरिमा को धूमिल करने का ठप्पा लगता जा रहा है। अभी उनमें श्रीकांत पाण्डेय, अशोक वाजपेयी, बालान नाम्बिआर, के. के. चक्रवर्ती इत्यादि।
पाण्डेय की मुहिम
छीछालेदर तब उजगार हुई जब एक सदस्य श्रीकांत पाण्डेय ने सचिव सुधाकर शर्मा के खिलाफ तानाशाही और अनियमितताओं के आरोप लगाते हुए मामले को अदालत में घसीटा। बताते हैं आज सुधाकर शर्मा पर अनेकों मुकदमें अदालत में लंबित हैं। श्रीकांत पाण्डेय द्वारा दायर मुकदमे के बाद अनुशासनिक समिति का गठन हुआ, इस समिति का अध्यक्ष के. के. चक्रवर्ती को बनाया गया, के. के. चक्रवर्ती ने सुधाकर शर्मा को दोषी पाया। इसके बाद से सुधाकर शर्मा की नजरों में श्रीकांत पाण्डेय और के. के. चक्रवर्ती दोनों अकादमी की गरिमा को धूमिल करने वाले प्रमुख व्यक्ति हो गए। सुधाकर शर्मा के खिलाफ कारवाई कराने में कामयाबी के बाद उत्साहित श्रीकांत पाण्डेय ने पूर्व सदस्यों द्वारा किये गए भ्रष्टाचार को उजागर करने की मुहिम छेड़ दी। अब सुना जा रहा है कि कुछ शिकायतकर्ताओं को अकादमी की काली सूचि में डालने की तैयारी चल रही है।
पूर्व में अध्यक्ष अशोक वाजपेयी ने सुधाकर शर्मा की अनियमितताओं के कारण सचिव के पद से हटा दिया था। इसलिए अशोक वाजपेयी ललित कला अकादमी के दुश्मन बताए जाने लगे। बालान नाम्बिआर ने भी अन्य लोगों की तरह अकादमी में हो रहे भ्रष्टाचार को उजागर करने की कोशिश की जिस कारण इन्हें कथित भ्रष्टाचारियों के कोप का भजन बनना पड़ा। सचिव सुधाकर शर्मा ने बालान नाम्बिआर को प्रताडि़त करने के लिए अनेक   उपाय किये। बालान नाम्बिआर का कहना है की जबतक सुधाकर शर्मा अकादमी में रहेंगे, वे अकादमी के अन्दर कदम नहीं रखेंगे।
अब स्थिति ये है कि अकादमी के सदस्य श्रीकांत पाण्डेय का आरोप हैं कि भ्रष्टाचारियों ने अकादमी का अपहरण कर लिया है। ऐसे लोग अकादमी का मनमाने तरीके से दुरूपयोग कर रहे हैं। अकादमी में सुधार के लिए किए जा रहे उनके प्रयासों के चलते मनमानी करने वालों कि गतिविधियों पर अंकुश लगा है। ऐसे में अब सचिव सुधाकर शर्मा और उनके सिपहसालार श्रीकांत पाण्डेय को परेशान करने का हर हथकंड़ा आजमाने में लगे हैँ, इसके तहत पाण्डेय को काली सूचि में डालकर किनारे लगाना शामिल है। इसी के साथ उन्हें कारण बताओ नोटिस दिए जाने की भी चर्चा हैं। उधर श्रीकांत पाण्डेय कहते हैं कि उन्होंने भी कमर कस ली है और ईट का जबाब पत्थर से देने के लिए तैयार बैठे हैं। अगर अधिकारियों ने मनमानी करने की कोशिश की तो वे इन सभी को अदालत में घसीटने से परहेज नहीं करेंगे।

शनिवार, 8 सितंबर 2012

कलाकृतियों की सरकारी खरीद की तैयारी

कलाकृतियों की सरकारी खरीद की तैयारी 

मूमल नेटवर्क, जयपुर। राजस्थान के वरिष्ठ कलाकारों के एक समूह ने अपनी पेंटिग्स की सरकारी खरीद के लिए 26 साल पुराने बोतल में बंद एक नियम को फिर से बाहर निकालने की जद्दोजहद शुरू की है। इस नियम के तहत यह व्यवस्था थी कि किसी भी नवनिर्मित सरकारी इमारत की सजावट में उसके निर्माण के कुल बजट का एक निश्चित भाग कलाकृतियों की खरीद पर व्यय किया जाता था।
बाद में वक्त की धूल में यह नियम दब गया और सरकारी भवनों में पर्यटन निगम के पोस्टर आदि दीवारों पर लगाए जाते रहे। अब राजस्थान ललित कला अकादमी में उसी समूह के एक कलाकार के अध्यक्ष मनोनीत होने के बाद इस पुराने नियम के आधार पर नए भवनों के लिए कलाकृतियों की खरीद के प्रस्ताव बनाए जा रहे हैं। फिलहाल केवल अकादमी से जुड़े राजस्थान के चित्रकारों की कलाकृतियों की खरीद का प्रस्ताव ही बन रहा है। इसी के साथ यह बात उठने लगी है कि नए भवनों की सजावट के लिए केवल चित्र ही क्यों? स्कल्पचर या शिल्प भी क्यों नहीं? बात तो यह भी उठ रही है कि केवल राजस्थान के या अकादमी से जुड़े कलाकारों की कृतियां ही क्यों? सुंदरता या सजावट के लिए प्रांतों की सीमाएं तोड़कर उस प्रत्येक कलाकृति को स्थान क्यों नहीं दिया जा सकता जो सुंदर हों और भविष्य में अपनी बढ़ती कीमत के अनुसार सरकार के खजाने का मूल्य भी बढ़ाएं।

1986 में हुई थी अंतिम खरीद

अकादमी से सरकारी स्तर पर अंतिम खरीद वर्ष 1986 में हुई थी। इसके बाद अकादमी द्वारा कई बार प्रयास करने के बावजूद सरकार ने ध्यान नहीं दिया। इसी का परिणाम रहा कि शहर के मॉडर्न आर्ट और मिनिएचर कला बाजार की ग्रोथ रेट बेहद धीमी रही।

एक इमारत में लाखों की खरीद

एक अनुमान के अनुसार महज एक सरकारी इमारत की लागत में खर्च होने वाले कुल बजट का केवल दो प्रतिशत बजट भी कला बाजार पर खर्च किया जाए, तो यह आकड़ा लाखों रूपए में पहुंचता है। इस कारण न सिर्फ  कला बाजार का टर्न ऑवर मूव करेगा, बल्कि कलाकारों को क्लाइंट के रूप में सरकारी मदद भी मिलेगी।
 (इस संबंध में और विस्तार से जानकारी एकत्र की जा रही है जो इसी साइट पर उपलब्ध होगी)