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सोमवार, 10 जून 2019

कला से संवरता पर्यावरण


कला से संवरता पर्यावरण
मूमल नेटवर्क, जयपुर। आज पर्यावरण संरक्षण एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है और प्रदूषित भविष्य मुंह फैलाए हमारा इंतजार कर रहा है. प्रदूषण आज हर तरफ है और जीवन में उपयोग आने वाली लगभग हर वस्तु के साथ प्रदूषण जुड़ गया है, चाहे वह यातायात के साधन हों, खाने-पीने की चीजें हों, उत्पादन के साधन हों यह हमारा काम आसान बनाने वाले कंप्यूटर और मोबाइल, सब प्रदूषण को बढ़ावा दे रहे हैं और यह प्रदूषण रोजाना कई लोगों की जान ले रहा है. आज इसी प्रदूषण के कारण ग्लोबल वार्मिंग भी बढ़ रही है और पूरे विश्व में तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। आने वाले वक्त में यह समस्या और ज्यादा बढऩे वाली है अगर अभी से कुछ मजबूत कदम नहीं उठाये गए और लोगों में जागरूकता नहीं फैलाई गई. इस समस्या को भांपते हुए और विश्व के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए कलाकार भी लोगों में इसके प्रति जागरूकता लाने के प्रयासों में जुटे हुए हैं और अपनी कला के माध्यम से लोगों को पर्यावरण संरक्षण का सन्देश दे रहे हैं। ऐसे ही एक युवा कलाकार हैं जयपुर के मुकेश ज्वाला जिन्होंने इस क्षेत्र में काम शुरू किया है और वे अपनी कलाकृतियों के जरिये यह सन्देश फैलाने के प्रयास में लगे हैं. स्कूलों और कॉलेज में छात्रों कोपर्यावरण के विषय में जागरूक करने और पर्यावरण संरक्षण का महत्त्व समझाने के साथ-साथ ही मुकेश ज्वाला ने अब अपना रुख कॉर्पोरेट जगत की ओर किया है। हाल ही मुकेश ज्वाला ने साथी कलाकार सुनील कुमावत के साथ मिलकर भारतीय स्टेट बैंक के लिए इलेक्ट्रोनिक कचरे से एक आकर्षक प्रतिमा का निर्माण किया है और प्रतिमा के जरिए पर्यावरण संरक्षण के सन्देश और महत्व को बहुत अच्छे तरीके से समझाया है।

यह है प्रतिमा
प्रतिमा अपने बाएं हाथ में पृथ्वी को सीने से लगाए नजाकत से इस प्रकार संभाले हुए है जिस तरह से एक माँ अपने बच्चों को संभालती है और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रही है। इस प्रतिमा के जरिये जहाँ एक ओर बढ़ते इलेक्ट्रोनिक कचरे का कलात्मक प्रबंधन दिखाया गया है वहीँ दूसरी तरफ स्टेट बैंक के लिए भी एक इतिहास रचा गया है. मुकेश ने साथी कलाकार सुनील के साथ मिलकर पहली बार स्टेट बैंक को एक मानव रूप में अवतरित किया है और बैंक को एक प्रगतिशील महिला का रूप दिया है।
इस 15 फीट ऊंची कलाकृति को भारतीय स्टेट बैंक के जयपुर स्थित स्टेट बैंक लर्निंग एंड डेवलपमेंट सेण्टर में लगाया गया है। इस कलाकृति को आधिकारिक तौर पर 'पुनर्नवा' (रिन्यूड) नाम दिया गया है।  40 दिन में बनने वाली प्रतिमा में कंप्यूटर के लगभग 8000 पाट्र्स लगाए गए हैं। इसमें 20 सीआरटी मॉनिटर, 70 सीपीयू , 110 कीबोर्ड  और  कम्प्युटर  का  अन्य समान जैसे माउस, मॉड़म, सॉकेट, हार्डडिस्क, डीवीडीप्लेयर, फ्लॉपि ड्राइव, रैम, एसएमपीएस और  सीपीयू  की बॉडी का इस्तेमाल किया गया है। कलाकृति का ढांचा बनाने में लोहे का इस्तेमाल किया गया और उसके ऊपर इलेक्ट्रोनिक वेस्टका इस्तेमाल किया गया है। इलेक्ट्रोनिक कचरे से बनी यह प्रतिमा आकर्षक है। प्रतिमा के हाथ में प्रदर्शित आधे ग्लोब की समतल जगह पर बिल्डिंगे बनाई है जो पृथ्वी पर हो रही गतिविधियों को दर्शाती है । कलाकारों ने इसे मदर एसबीआई नाम देते हुये स्टेट बैंक को एक माँ के रूप में प्रदर्शित करने का प्रयास किया है। कलाकारों ने पहली बार स्टेट बैंक का मानवीकरण करने का प्रयास करते हुए बैंक के कर्मचारियों, शाखाओं और उत्पादों आदि को एक साथसमेटकर एक इकाई में मानव शरीर के रूप में प्रदर्शित किया ताकि स्टेट बैंक का नाम आते ही एक छवि जेहन में उभर सके। यह प्रतिम स्टेट बैंक के जयपुर मंडल के तत्कालीनमुख्य महाप्रबंधक विजय रंजन की पहल पर तैयार हुई है। 

रविवार, 1 जुलाई 2018

सांस्कृतिक संस्थाओं की आर्थिक मदद करेगी सरकार

सांस्कृतिक संस्थाओं की आर्थिक मदद करेगी सरकार
आवेदन की अन्तिम तिथि 23 जुलाई 
सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए बनायी योजना 
मूमल नेटवर्क, पटना। सरकार ने प्रदेश में सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए सांस्कृतिक संस्थाओं की आर्थिक मदद करने का निर्णय लिया है। यह सहायता बिहार स्वैच्छिक सांस्कृतिक संस्थाओं को वित्तीय सहायता नियमावली, 2012 के नियमों के तहत दी जायेगी। सत्र 2018-19 के लिए कला, संस्कृति एवं युवा विभाग ने निबंधित संस्थाओं से इस साल 23 जुलाई तक आवेदन मांगे हैं।
 कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि सरकार ने जिन गतिविधियों के लिए आर्थिक सहायता देने का निर्णय लिया है उसमें कई तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम हैं. इसमें कार्यशाला, उत्सव महोत्सव, प्रदर्शनी, नये नाटक का प्रोडक्शन, चाक्षुष कला में अभिनव परियोजना, सेमिनार, आर्टिस्ट रेजिडेन्सी, संस्कृति के संरक्षण संबंधी कार्यक्रम, शोध सर्वेक्षण, प्रकाशन, अभिलेखीकरण और इनके लिए आवश्यक उपकरण की खरीद शामिल हैं।
जीर्णोद्धार के लिए भी मिलेगा अनुदान
विभाग के सूत्रों का कहना है कि जिन स्वैच्छिक सांस्कृतिक संस्थाओं के पास जमीन और भवन हैं उन्हें मूलभूत संरचना के जीर्णोद्धार के लिए अनुदान स्वीकृत किया जा सकेगा। इस क्रम में कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं के साथ बिहार राज्य के निबंधित कॉलेज और यूनिवर्सिटी को प्राथमिकता दी जायेगी।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश में सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए विभाग द्वारा शुक्र गुलजार और शनि बहार कार्यक्रम आयोजित होते हैं.
क्या कहते हैं मंत्री
 कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के मंत्री कृष्ण कुमार ऋषि ने कहा कि इस योजना का मकसद प्रदेश में सांस्कृतिक क्रियाकलाप को बढ़ावा देना है. उन्होंने कहा कि आने वाले प्रस्तावों पर विचार कर उसके लिए बजट की व्यवस्था की जायेगी।

शनिवार, 29 जुलाई 2017

स्विस आर्टिस्ट अलबर्टो जिकोमेट्टी पर फिल्म का प्रदर्शन

स्विस आर्टिस्ट अलबर्टो जिकोमेट्टी पर फिल्म का प्रदर्शन

मूमल नेटवर्क, लखनऊ। ललित कला अकादमी के अलीगंज स्थित क्षेत्रीय केन्द्र में आज शाम 4 बजे कला फिल्म दिखाई जाएगी। केन्द्र प्रभारी व क्षेत्रीय सचिव डॉ ज्योतिष जोषी ने जानकारी दी कि यह फिल्म अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के आर्टिस्ट अलबर्टो जिकोमेट्टी के कलाकर्म व जीवन पर फिल्मायी गई है।
कौन है अलबर्टो जिकोमेट्टी
इन स्विस कलाकार का जन्म 10 अक्टूबर 1901 के दिन स्विट्जरलैण्ड के बोरगोनोवो में हुआ। एक बेहतरीन मूर्तिकार, चित्रकार, ड्राफ्ट्समैन तथा प्रिंटमेकर के रूप में उन्होनें खास नाम कमाया। इनकी मृत्यु 11 जनवरी 1966 में हुई।

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

शुरु हुआ आर्टिस्ट कैम्प आर्ट फेस्टिवल

मूमल नेटवर्क, लखनऊ। ललित कला अकादमी के रीजनल सेन्टर में आज से मल्टी डिसिपिनरी आर्टिस्ट कैम्प आर्ट फेस्टिवल की शुरुआत हुई। कैम्प का समापन 18 फरवरी को होगा। समापन अवसर पर कैम्प में तैयार कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाई जाएगी। प्रदर्शनी का उद्घाटन उत्तर प्रदेश के संस्कृति विभाग के सेक्रेटरी डॉ. हरि ओम करेंगे।

शनिवार, 9 जुलाई 2016

पाकिस्तान के बिंदास न्यूड आर्टिस्ट


पाकिस्तान की गिनती अक्सर रूढ़िवादी देशों में की जाती है, जहां धर्म और नैतिकता आपकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच आ जाते हैं. लेकिन उसी पाकिस्तान में न्यूड तस्वीरों वाली आर्ट गैलरियां भी हैं.   
मोहम्मद अली पाकिस्तान में पेंटर हैं. अपनी एक न्यूड पेंटिंग दिखाते हुए वह कहते हैं कि पाकिस्तान में उनके काम को कभी भी सेंसर नहीं किया गया है. 27 साल के अली कराची की आर्ट गैलरी में ऐसे विषयों पर पेंटिंग बनाते हैं, जो आम तौर पर समाज में वर्जित हैं. राजनीति के अलावा सेक्स भी उनकी कला का एक विषय है. तो फिर उनकी पेंटिंग को ले कर कभी कोई हंगामा क्यों नहीं हुआ? वह बताते हैं, "यहां लोगों के पास पेट भरने के लिए खाना नहीं है और जो भूखा मर रहा है उसकी कला में कोई रुचि नहीं है."   
पाकिस्तान में ईशनिंदा और इज्जत के नाम पर खून-खराबा भी अनसुना नहीं है. ऐसे में अली जानते हैं कि उनका काम जोखिम भरा है, "मैंने कई बोल्ड और रिस्की चीजें बनाई हैं लेकिन में खुशकिस्मत हूं कि मुझे कभी किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा." लेकिन अली अकेले कलाकार नहीं हैं. कराची कला के लिहाज से उभर रहा है. समीरा राजा कराची में कैनवस गैलरी चलाती हैं. यहां कई न्यूड पेंटिंग्स हैं और ऐसी भी जो समलैंगिकों को दर्शाती हैं. अपनी गैलरी के बारे में वह बताती हैं, "कला की दुनिया में ये चीजें वर्जित नहीं हैं. लेकिन मैं यह भी जानती हूं कि में इन्हें पब्लिक प्लैटफॉर्म पर नहीं डाल सकती क्योंकि इससे कलाकार की जिंदगी खतरे में पड़ जाएगी."  
 
समीरा राजा मानती हैं कि उनके शोरूम में और पाकिस्तान के रईसों के घरों में ये पेंटिंग्स सुरक्षित हैं. वह बताती हैं कि पाकिस्तान में कला का बाजार बढ़ता जा रहा है. कराची यूनिवर्सिटी में कला के प्रोफेसर मुनवर अली सैयद भी इस बात से इत्तिफाक रखते हैं. वह बताते हैं कि यूनिवर्सिटी में सेल्फ सेंसरशिप पर भी ध्यान दिया जाता है, "हम यहां इस बात का ध्यान रखते हैं कि इंसानी जननांगों को ना दिखाएं. कुछ सीमाएं हैं." पर साथ ही वह यह भी मानते हैं कि जब किसी चीज पर रोक लगाई जाती है, तो उससे स्टूडेंट्स को नई दिशा भी मिल जाती है, जब आपको इस बात का अहसास होता है कि यहां सीमाएं हैं जिन्हें आप पार नहीं कर सकते, तब आप और भी ज्यादा कलात्मक हो जाते हैं."   
पाकिस्तान में अस्सी के दशक में जिया उल हक की तानाशाही के दौरान इस्लामी कट्टरपंथ को बढ़ावा मिला. लेकिन जिया उल हक के कत्ल के बाद नब्बे के दशक से कराची जैसे शहरों में बदलाव देखने को मिला. कभी जो छिप छिप के लोगों ने पेंटिंग बनानी शुरू की, आज गैलरी में प्रदर्शनियां लगा रहे हैं.    

साभार: आईबी/वीके (एएफपी) ईशा भाटिया

गुरुवार, 15 मई 2014

चुनावी मुद्दों में लापता कला संस्कृति

चुनावी महासमर के बाद अब इसके परिणाम भी सामने हैं। राजनीतिक बयानबाजी से हमेशा दूर रहने वाली 'मूमल' ने चुनावी शोर के दौरान ममता बनर्जी की एक पेंटिंस पर हुई पॉलिटिक्स पर एक समाचार से अपने कलाकार पाठकों को जरूर अवगत कराया और कोई ऐसी चर्चा नहीं की जिससे किसी राजनीतिक दल की ओर उसका रुझान दिखे। अब यह विचार जगजाहिर किया जा सकता है कि लोकसभा के भीषण चुनावी महाप्रचार में होना तो ये चाहिए था कि मुद्दे भी उतने ही अर्थपूर्ण, सरोकारी और सुदूर भारत तक के होते, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सत्ता की ऐसी झपटमारी रही कि राजनैतिक गर्जनाएं तो खूब सुनी गई, लेकिन कला या सांस्कृतिक गूंज कतई नहीं। एक पेंटिंग को लेकर बवाल जरूर हुआ वह भी खालिस राजनीतिक। वह भी मनी लाड्रिंग का ऐसा मुद्दा जिस पर मूमल में एक साल पहले व्यापक चर्चा हो चुकी थी।
संस्कृति-विहीन चुनाव
आपने इसे आसानी से राजनैतिक दलों के चुनाव प्रचारों में देखा होगा। वहां लोगों की सांस्कृतिक जरूरतें अभिव्यक्त नहीं हो रही थी। क्या कला और संस्कृति और मनुष्य की कुल जमा बेहतरी के बारे में वहां कोई जगह आप देख पाए? कार्यकर्ता और समर्थक के तौर पर तो आपको कुछ बुराई नजर नहीं आएगी, लेकिन आम नागरिक की निगाह से देखें तो चुनाव 2014 एक संस्कृति-विहीन चुनाव दिखता रहा। जहां राजनैतिक बौखलाहटों, ताकत की इतराहटों और अट्टहासों के बीच गरिमा, नैतिकता और अन्य मानवीय मूल्यों की आपराधिक अनदेखी की जाती रही, वहां कला-संस्कृति की बात करना ही बेमानी था।
बस इतनी ही संस्कृति रही
...और सांस्कृतिक जरूरतों के नाम पर हम क्या देखते हैं? हम पाते हैं कि धर्म और आस्था के वही रटे-रटाए और न जाने कब से दोहराए जाते रहे प्रतीकों को ही हमारे लोगों अर्थात कलाकारों के आगे कर दिया गया। बस इतनी ही संस्कृति रही। मिसाल के लिए बनारस को ही लें। बनारस का ऐसा घाटकरण कर दिया गया, मानो उसके आगे और अंदर कोई बनारस ही न हो. सारी बहसें सारा मीडिया घाटों और नकली अध्यात्म के हवाले से चुनावी गणित में अपने तीर-तुक्के चलाता रहा।  वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने अपने अनूठे रोड़ शो में ठीक ही कहा कि बनारस सिर्फ  घाट नहीं, वो उस बनारस को समझने के लिए निकले जो भारतीय भूगोल का एक अनजाना अदेखा और अस्पृश्य हिस्सा है। उन दलित उपेक्षित समाजों की कलात्मक और सांस्कृतिक जरूरत क्या बनारस का रंगारंग बनाया जा रहा चुनाव पूरी कर पाया? महापर्व बताए जा रहे चुनाव में इस बेहाली को शामिल क्यों नहीं किया जा सका? क्या ये नादानी रही या ये  एक सोचा-समझा गणित।
 काश! कोई तसल्ली मिलती
 इन चुनावों ने सबसे ज्यादा अगर आशंकित किया है तो सांस्कृतिक लिहाज से ही किया है। उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा संस्कृति, कला और समाज के प्रति क्या नजरिया रखती हैं, ये कोई रहस्य नहीं। इसीलिए चिंताएं तो होगी ही। काश!  अगर राजनैतिक दलों के प्रचार अभियानों में हमें इन चिंताओं और आशंकाओं का जवाब मिल पाता। कोई तसल्ली मिलती, कोई पक्का ठोस नैतिक आश्वासन। कला अकादमियों पर कोई ऐक्शन प्लान।
एक बेढंगे राष्ट्र के निर्माण की दिशा
ऐसा लगता है कि देश के कला या सांस्कृतिक ढांचे की सुरक्षा की बात आते ही राजनैतिक दलों और उनके अंधभक्तों को नींद आ जाती है। चुनाव संस्कृति का इससे बड़ा अभिशाप और क्या हो सकता है कि मनुष्य जीवन की कलात्मक कोमलताओं, संवेदनाओं, अनुभूतियों और नैतिकताओं के निर्माण की कार्रवाइयों और प्रयासों से वो बिलकुल खाली हो। जो समाज अपनी कला और अपने लोक-मूल्यों की हिफाजत में नाकाम रहता है वो कितनी भी तरक्की कर ले, बढ़ता तो वो एक बेढंगे राष्ट्र के निर्माण की दिशा में ही है। इतिहास में इसकी कई मिसालें हैं।
सबसे जरूरी सांस्कृतिक जरूरत
एक चुनाव में एक मतदाता की सबसे मानवीय और सबसे जरूरी सांस्कृतिक जरूरत क्या हो सकती है? वो हो सकती है उसकी संवेदना और उसकी निजी खुशियों की सुरक्षा। उसके सांस्कृतिक भूगोल की रक्षा। अपनी मिट्टी, अपनी अभिव्यक्ति, अपनी भाषा और अपनी परंपरा से बेदखली से सुरक्षा। क्या आज का चुनाव और आज के राजनैतिक दल ये आश्वासन और ये भरोसा दिला पाने की स्थिति में हैं? क्या वे दिल पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि उनके घोषणापत्रों में आम भारतीय जन की व्यथा-कथाओं और उनकी सांस्कृतिक अपेक्षाओं को समझने का कोई ईमानदार अध्याय है?
चलते...चलते मूमल अलर्ट
राजस्थान प्रदेश के परिपेक्ष में देखें तो यहां कला और संस्कृति के संरक्षण और कला गतिविधियों के नाम पर जो कुछ हुआ और हो रहा है वह किसी से छुपा नहीं है। 
आने वाले दिनों में गुलाबी नगर की कला और संस्कृति का केंद्र रही एक और विरासत का आमेर की हवेलियों वाला हश्र होने लगे तो हमें आश्चर्य नहीं होगा। लोग इसे आसानी से पचा लेगें..., लेकिन इन सांस्कृतिक चुप्पियों का क्या अर्थ है?  
हम एक एकांगी और खास आर्थिक सोच से निर्धारित सत्ता संरचनाओं की ओर बढ़ रहे हैं। हमारी बहुलतावादी संस्कृति और सांस्कृतिक सामाजिक वैविध्य इसकी इजाजत तो नहीं देते. उसकी खिड़कियों और दरवाजों ने अभी इतनी जंग नहीं खाई है कि कोई उन्हें उखाड़ कर वहां दीवार ही लगा दे।

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मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

अब बदलेगा कला, संस्कृति की अफसरशाही का परिदृश्य

अब बदलेगा कला, संस्कृति की अफसरशाही का परिदृश्य
मूमल नेटवर्क, जयपुर। राजस्थान की राजनीति में भाजपा की आंधी आने के बाद कला और संस्कृति से जुड़ी अफसरशाही और राजनैतिक नियुक्तियों में बड़ा उलटफेर होने वाला है। कांग्रेस सरकार के पतन के साथ ही ललित कला अकादमी सहित विभिन्न अकादमियों के अध्यक्षों ने इस्तीफा दे दिया है। विभिन्न संबंधित विभागों के आइएएस और आरएएस भी अपना सामान समेटने लगे हैं। इक्का-दुक्का अफसरों को छोड़ दिया जाए तो अब वसुंधरा सरकार 'सारे घर के बदलने' को आमादा है।
कौन होगा मंत्री 
यह समाचार लिखे जाने तक भाजपा मुख्यालय में चल रही बातों के अनुसार 13 दिसम्बर को होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में मात्र सात मंत्रियों को शपथ दिलाए जाने की तैयारी चल रही है। कला और संस्कृति तथा पर्यटन विभाग पहले कुछ दिनों तक मुख्यमंत्री स्वयं अपने पास रखने का विचार व्यक्त कर चुकी हैं, लेकिन प्रचंड बहुमत के साथ विधानसभा तक पहुंचे विभिन्न राजघरानों से जुड़े  जनप्रतिनिधियों की नजर इस मंत्रालय पर है। ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार के साथ ही पयर्टन व संस्कृति मंत्री के रूप में जयपुर या बीकानेर से किसी एक राजघराने को यह मंत्रालय मिल सकता है। सवाईमाघोपुर से जीतीं जयपुर राजघराने की दीया कुमारी की संभावनाएं अधिक लग रही हैं।
कौन होंगे अफसर 
सचिवालय में मुख्य सचिव के रूप में काफी कड़क माने जाने वाले राजीव महर्षि का नाम सबसे ऊपर चल रहा है। अब तक कांग्रेस सरकार के चलते वे प्रदेश के बाहर ही रहे। भारतीय प्रशासनिक सेवा के संजय मल्होत्रा और तन्मय कुमार भी मैडम की पसंद में शामिल हैं। बदलाव के बाद इन्हें न केवल आइएएस लॉबी को बेहतर हैंडल करना होगा वरन बदलाव को महसूस भी करना होगा। ऐसे में कला और संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव के रूप में किरण सोनी गुप्ता के स्थान पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी यादवेन्द्र माथुर को जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। हालांकि कला क्षेत्र की अधिक अनुभवी अदिति मेहता अधिक वरिष्ठ हैं, लेकिन उन्हें भी अब कला संस्कृति विभाग का भला करने के लिए चुना जा सकता है। एक लॉबी अभी उन्हें आगे लाने की सिफारिश में सक्रीय है।
रंगमंच और प्राधिकरण 
रवीन्द्र मंच का मूलभूत ढांचा बदलने में जुटी आरएएस अधिकारी नीतू राजेश्वर के बदले जाने की संभावना भी प्रबल है। हालांकि उन्हें समर्थ माना जा रहा है, लेकिन उन्हें सरकार को कर्मचारियों से लेकर कम्यूनिकेशन स्तर तक अधिक कड़ा रवैया अपनाने वाला अधिकारी होने के संकेत देने होंगे। प्राधिकरण में अभी अहमद बने रहेंगे यही लगता है। कांग्रेस सरकार में बीना काक की पसंद और शांति धारीवाल की मर्जी के चलते वे इस पद पर रहे और अब सीधे भावी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से बेहतर संबंधों के कारण वे इसी पद पर बने रह सकते हैं।

सोमवार, 26 नवंबर 2012

Indian Monalisa अर्थात किशनगढ़ की 'बणी-ठणी'

इंडियन 'मोनालिसा' कहलाने वाली राजस्थान कि किशनगढ़ रियासत की लोकप्रिय मिनियेचर पेंटिंग 'बणी-ठणी' के बारे में विस्तृत विवरण और अध्ययन यहां प्रस्तुत है। इसके लिए सीधे मूमल दर्शना पर आपका स्वागत है। विषय विशेष के सम्बन्ध में अधिक जानने के लिए शीर्षक को क्लिक करें। 
. एक था राजा... और एक 'बणी-ठणी'

. ऐसे बनी 'बणी-ठणी'

. आखिर किसने बनाई 'बणी-ठणी'

. 'बणी-ठणी' की देहभाषा

. 'बणी-ठणी' का एक समग्र दर्शन

. चित्रगीतिका में 'बणी-ठणी'

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

शिल्प और कला जगत की गतिविधियों से लबरेज इस अंक में जानिए...
केंकड़ों की कलाकारी.. पेज-1
भारतीय कला बाजार के सुनहरे दिन..  पेज-2
प्रदेश में सक्रीय कला प्रदर्शनों के दलाल.. पेज-3
जेकेके में सम्पन्न दो व्यावसायिक शो.. पेज-5
जेब की साइज में कलानेरी की कोशिश.. पेज-5
बंगभूमि की विभिन्न चित्रांकन शैलियां.. पेज-9
दर्शक संस्था की दर्शना में दस्तक.. बैक कवर

...और भी बहुत कुछ जिसकी मूमल से उम्मीद की जा सकती है।
अगर आप मूमल पत्रिका के नियमित सदस्य हैं तो यह इसकी प्रति (हार्ड कॉपी) आपके पते पर डाक से भी भेजी गई है।
सोलह पेज का पूरा प्रकाशन पाने के लिए नीचे टिप्पणी के स्थान पर अपना ई-मेल हमें भेजें। ताकि हम पेपर की पीडीएफ कॉपी भेज सकें। आप अपना ई-मेल हमारे ई-मेल (moomalnews@gmail.com) पर भी छोड़ सकते हैं।
आपका स्वागत हैं।
आपकी मूमल

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

प्रदेश में सक्रीय कला प्रदर्शिनियों के मध्यस्त

मारीशस में प्रदर्शन के नाम पर लगाया कई कलाकारों को चूना
किसी ने पांच हजार लिए तो किसी ने ढाई हजार रु. वसूले
मूमल नेटवर्क, जयपुर। पिछले दिनों मारीशस में लगे एक ट्रेड फेयर में भारत से ले जाई गई कलाकृतियों के प्रदर्शन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। प्रभावित कलाकारों को कहना है कि पैसे लेकर भी प्रदर्शनी में उनका काम प्रदर्शित नहीं किया गया जबकि प्रदर्शन का बीड़ा उठाने वाले कहते है कि हमने इस काम में काफी घाटा उठाया।
मूमल को दिल्ली सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इन दिनों राजधानी में कला प्रदर्शिनियों के दलालों की सक्रियता यकायक बढ़ गई है। खासकर विदेशों मे शो कराने के नाम पर कलाकारों से काफी पैसा वसूल किया जा रहा है।  पिछले दिनों दिल्ली में सक्रीय दो मध्यस्थों ने मारिशस में आयोजित हुए एक ट्रेड फेयर में प्रदर्शित करने के लिए राजस्थान सहित देशभर के कलाकारों से काफी धन बटोरा। इनमें से एक ने 15 और एक अन्य ने 25 कलाकारों की कृतियां प्रदर्शन के लिए बुक की।
यूं हुआ घोटाला
मारीशस के एक ट्रेड फेयर में दिल्ली के दो मध्यस्थों, सामान्य बोलचाल की भाषा में कहे तो  दलालों ने दस बाई दस की दो अलग-अलग स्टाल्स बुक कराई। उसके बाद उन्होंने कलाकारों से उनकी कलाकृतियां प्रदर्शित करने के लिए 5 हजार रुपए प्रति पेंर्टिग्स की दर से पेसा वसूला किसी भी कलाकार ने दो से अधिक काम नहीं दिए। पांच हजार रुपए वसूलने वाले दलाल को करीब 15 कलाकारों के 20 काम मिले और फिर काम ढीला पड़ गया। उधर दूसरे दलाल ने 5 हजार रुपए में दो पेंटिंग्स प्रदर्शित करने के नाम पर 25 कलाकारों के 50 काम ले लिए। निर्धारित तिथि पर दोनों ट्रेड फेयर में पहुंचे, कुछ पेंटिंग्स भी साथ ले गए। जब बुक की हुई स्टाल का पैसा चुकाने का समय आया तो कोई भी पूरी स्टॉल का किराया देने की स्थिति में नहीं था। एक ने अपने साथ चावल के दाने पर नाम लिखनेे वाले एक अन्य कलाकार को पार्टनर बनाया तो दूसरे ने किन्ही श्रीमती नियाजी के नाम से बुक स्टाल में आधी जगह पाने के लिए मोटी रकम चुकाई।
अब दोनों के पास ही अलग-अलग जगह आधी-आधी स्टॉल थी। ऐसे में दोनों ही किसी का कोई काम प्रदर्शित करने की स्थिति में नहीं थे, सेल की तो बात ही दूर रही। एक ने  अपनी थोड़ी सी जगह में आगंतुकों के प्रोटेट बनाने शुरू किए और पैसा बनाया। जबकि दूसरा यह भी नहीं कर पाया क्यों कि वह कलाकार भी नहीं था।
यूं खुला मामला
ट्रेड फेयर के बाद जब कलाकारों को यह बताया गया कि उनकी कोई पेंटिंग नहीं बिकी, लेकिन काम लोगों ने पसंद किया है। भविष्य में उम्मीद है।
स्वभाव से सीधे कलाकारों ने उनकी बात सही मान कर संतोष कर लिया। उधर एक दूसरे के धंधे में टांग फंसाने से नाराज दलालों ने बदला लेने और आगामी आयोजनों से एक दूसरे का पत्ता काटने के विचार से कलाकारों के सम्मुख एक दूसरे की पोल खोलनी शुरू की। बस यहीं से कलाकार जागृत हुए और मूमल को दोनों ओर से जानकारियां मिलने लगी।

दलालों की सलाह पर प्रदर्शनी के प्रमाण में कलाकारों ने प्रदर्शनी में लगे उनके काम के फोटोग्राफ चाहे। ट्रेड फेयर में बुक स्टॉल के लिए किए गए भुगतान की रसीद दिखाने को कहा। अब दलाल बगले झांकने लगे। एक दूसरे के लिए खोदी खाई में गिरे दलालों में से एक ने बताया कि उसने तो अपनी स्टॉल के पैसे चुकाए और उसके पास रसीद भी है। उसने प्रतिदिन कुछ-कुछ कलाकारों का काम प्रदर्शित किया और फोटो भी खींचे। उसके बाद कैमरा खराब जाने के कारण वह फोटोग्राफ किसी को दिखा नहीं पाया। उसने दूसरे दलाल के लिए बताया कि उसे तो आयोजकों ने जैसे-तैसे एक  मिसेज नियाजी के स्टॉल में आधी जगह दिलाई। उसने वहां एक दिन नियाजी मैडम के आने से पहले पूरे स्टॉल में अपने साथ लाई कुछ पेंटिंग्स को बारी-बारी से लगा कर फोटोग्राफी शुरू की, लेकिन इस बीच मैडम नियाजी आ गई तो झगड़ा भी हुआ। बाद में तो उसके पास पेंटिंग्स रखने का ठिकाना भी नहीं था और उसके लाई पेंटिंग्स मेरे स्टॉल में टेबिल के नीचे रख्री जाती थी।

इसकी पुष्टि किए जाने पर दूसरे दलाल ने सभी बातें बेबुनियाद और गलत बताते हुए पहले के लिए कहा कि उसने अपने स्टॉल में चावल पर नाम लिखने वाले को आधी जगह दे दी। आधी जगह में कितनी पेंङ्क्षटग्स लगने की गुजाइश थी? यह तो कोई भी जान सकता है। अब ऐसे में कैमरा खराब नहीं होता तो क्या होता?

कुल मिलाकर कलाकारों से उनकी कृतियों के प्रदर्शन और सेल के नाम पर पैसे लेने वाले दोनों दलालों ने एक दूसरे की पोल जमकर खोली। दोनों ने बताया कि उनके पास प्रदर्शित की जाने वाली कृतियों के लिए तैयार किया हुआ कैटेलॉग है। स्टॉल के भुगतान किए धन की रसीद और प्रदर्शनी के कुछ फोटोग्राफ हैं। मूमल से हुई बातचीत में दोनों ने ही इनकी प्रतिलिपियां ई-मेल पर भेजने की बात कही, लेकिन बार-बार याद दिलाए जाने के बावजूद समाचार लिखें जाने तक दोनों की ओर से कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं कराए गए।
अन्तत:
विदेशों में प्रदर्शन को लेकर उत्सुक और महत्वाकांक्षी कलाकार ही इस ठगी के शिकार हुए हैं। गांठ से रकम गंवाने के बाद भी ना तो उनकी कोई कृति बिकी और न ही प्रदर्शित ही हो पाई। और तो और अपनी प्रदर्शन उपलिब्धयों में जोडऩे के लिए एक कैटलाग या फोटोग्राफी तक नहीं जुट पाई। इन ठगे-ठगे से कलाकारों में दिल्ल्ी के वरिष्ठ कलाकारों के साथ यू.पी. और राजस्थान के कलाकार भी शामिल हैं।

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

कला शिक्षा के लिए अनोखा धरना

  पहली अक्तूबर से जयपुर में होगा 

मूमल नेटवर्क जयपुर। कला शिक्षकों की भर्ती के लिए चल रही जद्दोजहद के चलते अब कलाकारों ने अपनी बात जग जाहिर करने के लिए अनोखा तरीका अपनाया है। इस क्रम में कलाकारों ने जयपुर स्थित शिक्षा संकुल के बाहर बड़े स्तर पर धरने व प्रदर्शन का आयोजन रखा है। इसमें खास बात यह है कि पहली अक्टूबर 2012 से शुरू होने वाले इस आंदोलन के दौरान कलाकार अपनी कला का सार्वजनिक प्रदर्शन भी करते रहेंगे। यह सब 15 अक्टूबर तक चलने की संभावना है।
राजस्थान बेरोजगार चित्रकला अभ्यर्थी संगठन सचिव महेश कुमार गुर्जर ने बताया कि शिक्षा विभाग में कला शिक्षकों की भर्ती पिछले 20 सालों से बंद पड़ी है। इसे फिर से शुरू कराने के लिए पूरे प्रदेश के कला अभ्यर्थी इस आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। इनमें चित्रकला, मूर्तिकला और संगीत क्षेत्र के अभ्यर्थी एक साथ अपनी बात शिक्षा विभाग और आमजन के सामने रखेंगे। गुर्जर के अनुसार प्रदेशभर में उनके सम्पर्क लगातार बने हुए हैं और ताजा स्थिति के आधार पर यह कहा जा सकता है कि एक पखवाड़े तक चलने वाले आंदोलन में लगभग 500 अभ्यर्थियों की सक्रीय भागीदारी होगी।
संगठन के उपाध्यक्ष झाबरमल वर्मा के अनुसार राजस्थान में पिछले 20 सालों से सरकारी विद्यालयों में कला शिक्षा पाठ्यक्रम के साथ भेदभावपूर्ण नीति अपनाई जा रही है। इस विषय के लाखों बच्चों के साथ खिलवाड़ हो रहा है। उन्हे इस विषय की शिक्षा वे शिक्षक दे रहे हैं जिनके पास चित्रकला की कोई डिग्री नहीं है।
कोटा से मूमल प्रतिनिधि विजेन्द्र कुमार वर्मा ने बताया कि कला शिक्षकों की भर्ती की मांग को लेकर एक प्रतिनिधि मंडल ने कोटा, बूंदी, बारां ओर झालावाड़ के जिला कलक्टर्स को ज्ञापन दिए हैं। जयपुर में होने वाले आंदोलन में भाग लेने के लिए कोटा से अभ्यर्थी कलाकारों का एक दल आ रहा है।
उदयपुर से मूमल संवाददाता के अनुसार वहां इस आंदोलन से जुड़े लोग फिलहाल सुस्त हैं। जयपुर से अभ्यर्थी संगठन के पदाधिकारियों ने उदयपुर के लिए कला अभ्यर्थी शरद भारद्वाज को जिम्मेदारी सौपी थी , लेकिन अब वहां व्यक्ति बदला जा रहा है।

फेसबुक पर व्यापक चर्चा
कलाकार नवलसिंह चौहान ने इस आंदोलन के लिए 'फेसबुकÓ पर अभियान छेड़ रखा है। उनके अभियान को कला जगत में बेहतर समर्थन मिल रहा है। चौहान के प्रयासों से जो सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उभरा है वह यह कि आम और खास सभी कलाकारों के साथ आमजन को भी यह स्पस्ट हो रहा है कि राजस्थान के शिक्षा विभाग  में कितनी धांधली चल रही है? विभाग के सभी विद्यालयों में जो बच्चों को जो शिक्षक चित्रकला विषय को ज्ञान दे रहे हैं उनके पास चित्रकला विषय की कोई उपाधि नहीं है। दूसरी और जिनके पास चित्रकला विषय में स्नातक उपाधियां है वे स्लेट, नेट, में प्रयास कर रहे हैं। बहुत से पी.एच.डी. कर के टाइमपास कर रहे हैं। बहुत से मामलों में कला अभ्यर्थी केवीएस, एनवीएस और डीएसएसएसबी में जॉब तलाश रहे हैं।
फेसबुक में इस विषय पर अनेक रोचक टिप्पणियां भी सामने आ रही हैं।
एक कलाकार ने लिखा है ' वैसे तो ये कला अभ्यर्थी विभिन्न शहरों में आयोजित होने वाले कला मेलों मेंं भाग लेने के लिए अपने खर्चे पर जाते रहते हैं और रोजगार दिलाने के होने वाले इस आंदोलन में आने के लिए अगर-मगर कर रहें हैं।
एक अन्य टिप्पणी में लिखा है कि 'अभी तो इसे कोई तव्वजों नहीं दे रहे हैं, लेकिन जब कला के कॉलेज व्याख्याता और स्कूली व्याख्याता के लिए सैकेंड ग्रेड की भर्ती खुलेगी तो सबसे पहले वही कला अभ्यर्थी फार्म भरने के लिए दौड़ेंगे जो अभी साथ नहीं दे रहे हैं।
विधानसभा सत्र से भी उम्मीद
आदोलन के आयोजकों को 10 अक्टूबर से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र से भी काफी उम्मीद हैं। विधायक राजेन्द्र सिंह राठौड़ ने उन्हें विश्वास दिलाया है कि वे विधानसभा में बेरोजगार चित्रकला अभ्यर्थियों का सवाल प्रमुखता से उठाएगें।

शनिवार, 8 सितंबर 2012

कलाकृतियों की सरकारी खरीद की तैयारी

कलाकृतियों की सरकारी खरीद की तैयारी 

मूमल नेटवर्क, जयपुर। राजस्थान के वरिष्ठ कलाकारों के एक समूह ने अपनी पेंटिग्स की सरकारी खरीद के लिए 26 साल पुराने बोतल में बंद एक नियम को फिर से बाहर निकालने की जद्दोजहद शुरू की है। इस नियम के तहत यह व्यवस्था थी कि किसी भी नवनिर्मित सरकारी इमारत की सजावट में उसके निर्माण के कुल बजट का एक निश्चित भाग कलाकृतियों की खरीद पर व्यय किया जाता था।
बाद में वक्त की धूल में यह नियम दब गया और सरकारी भवनों में पर्यटन निगम के पोस्टर आदि दीवारों पर लगाए जाते रहे। अब राजस्थान ललित कला अकादमी में उसी समूह के एक कलाकार के अध्यक्ष मनोनीत होने के बाद इस पुराने नियम के आधार पर नए भवनों के लिए कलाकृतियों की खरीद के प्रस्ताव बनाए जा रहे हैं। फिलहाल केवल अकादमी से जुड़े राजस्थान के चित्रकारों की कलाकृतियों की खरीद का प्रस्ताव ही बन रहा है। इसी के साथ यह बात उठने लगी है कि नए भवनों की सजावट के लिए केवल चित्र ही क्यों? स्कल्पचर या शिल्प भी क्यों नहीं? बात तो यह भी उठ रही है कि केवल राजस्थान के या अकादमी से जुड़े कलाकारों की कृतियां ही क्यों? सुंदरता या सजावट के लिए प्रांतों की सीमाएं तोड़कर उस प्रत्येक कलाकृति को स्थान क्यों नहीं दिया जा सकता जो सुंदर हों और भविष्य में अपनी बढ़ती कीमत के अनुसार सरकार के खजाने का मूल्य भी बढ़ाएं।

1986 में हुई थी अंतिम खरीद

अकादमी से सरकारी स्तर पर अंतिम खरीद वर्ष 1986 में हुई थी। इसके बाद अकादमी द्वारा कई बार प्रयास करने के बावजूद सरकार ने ध्यान नहीं दिया। इसी का परिणाम रहा कि शहर के मॉडर्न आर्ट और मिनिएचर कला बाजार की ग्रोथ रेट बेहद धीमी रही।

एक इमारत में लाखों की खरीद

एक अनुमान के अनुसार महज एक सरकारी इमारत की लागत में खर्च होने वाले कुल बजट का केवल दो प्रतिशत बजट भी कला बाजार पर खर्च किया जाए, तो यह आकड़ा लाखों रूपए में पहुंचता है। इस कारण न सिर्फ  कला बाजार का टर्न ऑवर मूव करेगा, बल्कि कलाकारों को क्लाइंट के रूप में सरकारी मदद भी मिलेगी।
 (इस संबंध में और विस्तार से जानकारी एकत्र की जा रही है जो इसी साइट पर उपलब्ध होगी)