मंगलवार, 10 मार्च 2015

कला मेला में पहली बार

 स्मारिका प्रकाशन, कलाविदों के लेख
मूमल नेटवर्क, जयपुर। राज. ललित कला अकादमी के जयपुर मेंं होने वाले 18वें कला मेले में पहली-पहली बार होने वाली अनके बातों के क्रम में एक स्मारिका का प्रकाशन भी है । कला विषयों पर आधारित लेखों और विचारों से सजी इस स्मारिका में शहर व राज्य के चुने हुए लेखकों व कलाकारों द्वारा लिखे गए  लिखे लेख पढऩे को मिलेंगे।
कला मेले के लिए पहली बार मिले पर्याप्त बजट के चलते स्मारिका प्रकाशन की योजना बनी। अभी इस बात की जानकारी नहीं मिल पाई हैं कि स्मारिका में प्रमुख रूप से कौन-कौन से चित्रकार कलम उठाने वाले हैं, लेकिन स्मारिका के लिए बड़े  पैमाने पर की जा रही तैयारियों के चलते  कला जगत को संभवत: कुछ चौंकाने वाली सौगातें मिलने जा रही है। खासकर लेखक कलाकारों को आकर्षक मानदेय और पाठकों को जानकारियां प्राप्त होंगी।

अर्जुन प्रजापति देंगे लाइव डेमो
मूमल नेटवर्क, जयपुर। इस वर्ष के 18वें कला मेले में प्रख्यात शिल्पी पद्मश्री अर्जुन प्रजापति की कला का लाइव डेमो चारों दिन देखने को मिलेगा। प्राप्त जानकारी के अनुसार अर्जुन प्रजापति राजस्थान के भक्तिकाल की नायिका मीराबाई की प्रतिमा को अपने सधे हुए हाथों से साकार करेंगे। वे इस डेमासेस्ट्रेशन के लिए राजस्थान ललित कला अकादमी से कोई मानदेय नहीं लेंगे। कला मेले के चार दिन वे मीराबाई की मूर्ति पर चरणबद्ध काम करेंगे। उनका यह डेमास्ट्रेशन कला विद्यार्थियों के साथ कला जिज्ञासुओं के लिए रोचक और शैक्षणिक होगा। 

कला मेले में चार भाषायी अकादमियां


भाषायी अकादमियों द्वारा प्रस्तुत कलाकार
मूमल नेटवर्क, जयपुर। राजस्थान ललित कला अकादमी द्वारा आयोजित 18वें कला मेले में प्रदेश की चार भाषायी अकादमियां सक्रीय रूप से भाग ले रही हैं। इन अकादमियों की ओर से वेद विज्ञान, सिंधु संस्कृति, लोक गायन, कवि सम्मेलन व मुशायरे के साथ चित्रकला और केलीग्राफी के कैंप भी आयोजित कराए जाएंगे। इनके द्वारा प्रायोजित कैंप में शामिल होने वाले कलाकारों की सूची निम्र है।
राजस्थान संस्कृत अकादमी
वेद विज्ञान चित्रवीथिका कार्यशाला
डा. अन्नपूर्णा शुक्ला
अमित कल्ला
ऋषिकेश गोस्वामी
कनुप्रिया राठौड़
जयन्त गुप्ता
निधि पालीवाल
प्रमोद कुमार सिंह
बिलसेन्दु शील
योगेन्द्र पुरोहित
लक्ष्पण प्रसाद
विष्णु सैनी
शुभंकर बिस्वास
सचिन सांकलकर
स्वपना बिस्वास
कृघ्णा महावर
राजस्थान सिन्धी अकादमी
सिन्धु संस्कृति चित्र कार्यशाला
प्रिया परयाणी, अहमदाबाद
घन्श्याम सागर, अहमदाबाद
श्याम सुंदर राजानी, भीलवाड़ा
जगदीश सावलानी, जयपुर
राजस्थान ऊर्दू अकादमी
कैलीग्राफी आर्ट कैंप
खुशीर्द आलम
जफर रजा
मुरलीधर
अतिउल्लाह
मो. अब्दुल गफ्फार
अताउल्लाह अख्तर
अबुवक्त काजी
हरिशंकर बालामोतिया
अब्दुल गनी
मिर्जा हबीब बेग पारस

शनिवार, 7 मार्च 2015

कला मेला कैम्स के कलाकारों के नाम

18वें कला मेला कैम्स के लिए 28 कलाकारों के नाम
राजस्थान ललित कला अकादमी की ओर से जयपुर में आयोजित 18वें कला मेला में लगने वाले विभिन्न आर्ट कैम्स के लिए देशभर से कलाकारों का चयन किया जा रहा है। मूमल को मिली जानकारी के अनुसार कलाकारों के नामों पर अंतिम दौर का विचार चल रहा है। यहां दिए जा रहे 28 नाम उन कलाकारों के हैं जिनके भाग लेने की लगभग पूरी संभावना हैं। यह वे हैं जो राजस्थान ललित कला अकादमी, ललित कला अकादमी नई दिल्ली व पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र उदयपुर द्वारा आयोजित कैम्स के लिए हैं। इनके अलावा अभी राजस्थान की संस्कृत, उर्दू तथा सिंधी अकादमियों की ओर से आयोजित होने वाले आर्ट कैम्स के लिए कलाकारों के नामों पर अंतिम मोहर लगना शेष है। कलाकारों के पास प्रस्ताव भेजे गए हैं। उनकी स्वीकृति मिलने या नहीं मिलने पर अंतिम समय तक नामों पर विचार संभव है।
राजस्थान ललित कला अकादमी
सुश्री कविता नायर, नोयडा
सुश्री शोभा ब्रूटा, दिल्ली
श्री अवधेश मिश्र, लखनउ
श्री जयन्ती राबडिया, बड़ोदरा
श्री जयकृष्ण शर्मा लखनऊ
गोपी गजवानी  दिल्ली
श्री सोमनाथ मेती, कलकता
श्री शैल चौयल, उदयपुर
श्री कालीचरण गुप्ता, नई दिल्ली
श्री राम विरंजन, हरियाणा
ललित कला अकादमी नई दिल्ली
मयंक श्याम गोड़ पेन्टिग
हेमा देवी मधुबनी
दिलीप कुमार वर्लि पेन्ंिटंग
अनवर चित्रकार पटवा पेन्टिंग
प्रणव नारायण चित्रकार
सत्यनारायण सुथार, कावड़कला
कल्याणजोशी पडचित्रण भीलवाड़ा
श्याम लाल कुम्हार, मोलेला कला
कदम कलाकार, मांडणा
मोहन वर्मा, सांजी पेन्टिंग, मथुरा
पश्चिम क्षेत्र सास्कृतिक केंन्द्र
अब्बास बाटलीवाला उदयपुर
श्री विघासागर उपाध्याय जयपुर
श्री राम जैसवाल अजमेर
श्री भवानी शंकर शर्मा जयपुर
श्री गगन बिहारी दाधीच नाथद्वारा
श्री रामू रामदेव जयपुर
श्री महेश सिंह जयपुर
श्री गौरी शंकर सोनी जयपुर 

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

क्या आधुनिक कहलाने के लिए परंपरा में पलीता लगाना जरूरी?


क्या कला जगत में परंपरा की तिलांजली से ही आधुनिकता का बोध होता है? आधुनिकतावाद की धमकी चल रही है? अमूर्तन का आतंक व्याप्त है? कला चंचला होकर मौद्रिक हो गई है? भारतीय सौंदर्य दृष्टि को खारिज हो चुकी है? कलाकार स्वयं क्यों  नहीं बोलता है? समझ के अहं से सुलगती कथित समीक्षाओं का बोझ क्यों ढोता हैं?  ऐसे ही कुछ सुलगते सवालों से हमें रूबरू किया है वरिष्ठ लेखक और विचारक प्रभू जोशी ने।

यह अत्यंत विचारणीय तथ्य है कि भारत के अलावा दुनिया के किसी भी देश में ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण नहीं मिलता, जहां अपनी परंपरागत चित्र-शैली के साथ इतना और ऐसा अवमाननापूर्ण व्यवहार किया गया हो। यूरोपीय कला-जगत में आज उनका यथार्थवाद उतना ही समादृत है, जितना आधुनिकतावाद। 'आधुनिकतावादÓ अपनी सम्मानजनक विदाई के बाद आज भी वहां की कला-पत्रिकाओं के पृष्ठों पर निरंतर अपने लिए उल्लेखनीय जगह घेरे रहता है। यही कारण है कि वहां न तो 'मोनालिसाÓ को दफ्न किया गया है और न ही 'गुएर्निकाÓ को।
केवल महलों के लिए नहीं
अगर हम यूरोप की बात छोड़ कर, अन्य एशियाई मुल्कों में देखें तो वहां का समाज अपनी परंपरागत चित्र-शैलियों का अभूतपूर्व सम्मान, संवर्धन और संरक्षण करता आ रहा है। चीन, जापान, कोरिया या थोड़ा आगे बढ़ कर सुदूर मैक्सिको की तरफ  देखें तो वहां भी अपनी परंपरागत शैलियों में रची गई कृतियां केवल संग्रहालयों के ठंडे अंधेरे में उपेक्षा का जीवन जीने को अभिशप्त नहीं कर दी गई हैं। वे कला-प्रासादों की संपदा का हिस्सा नहीं, अलबत्ता सामान्य कला-प्रेमियों के स्पंदित आस्वाद का भी अंग हैं। यह जान कर सचमुच सुखद विस्मय होता है कि कला के 'समकालीनÓ मुहावरे में सृजनरत चित्रकारों से कहीं बड़ी बिरादरी इन मुल्कों में अपनी परंपरागत चित्र-शैलियों में काम करने वाले चित्रकारों की है और वे अपने कला-बाजार का एक बड़ा हिस्सा समेटे हुए हैं।
प्राप्ति के लिए स्वाहा
बदकिस्मती से भारत में शीतयुद्ध कालीन सांस्कृतिक कूटनीति ने 'आधुनिकतावादÓ से सम्मोहित ऐसे कलाकार और कला-मीमांसकों की बड़ी बिरादरी पैदा कर दी, जिसने भारत की सुदीर्घ कला-परंपरा के ध्वंस में संगठित रूप से काम किया। यहां याद करना रुचिकर होगा कि जब भारत स्वाधीन हुआ और नेहरू ने एक 'आधुनिकÓ भारत के निर्माण की राजनीतिक प्रतिज्ञा व्यक्त की तो सबसे पहले 'आधुनिकतावादÓ का वर्चस्व साहित्य के बजाय चित्रकला में बढ़ा। वहां कलाकारों को 'परंपराÓ के स्वाहा में ही 'आधुनिकताÓ के अभीष्ट की प्राप्ति का बोध हुआ। आधुनिकतावाद को लगभग एक धमकी की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा।
भय के गर्भ से
यह निरस्तीकरण के भय के गर्भ से पैदा हुआ एक ऐसा सफल और अप्रकट नियंत्रण बना, जिसने आखिरकार परंपरा के 'दमनÓ का रूप ले लिया। अच्छे-भले और परंपरागत-शैली के दक्ष सर्जक, अपने 'स्वत्वÓ को खोकर इस 'आधुनिकतावादÓ के अधीन हो गए, जिसमें 'अमूर्तनÓ का आतंक समाहित था। दिलचस्प स्थिति तो यह थी कि लगे हाथ भारत में ऐसे मौलिक कला-विचारकों का उदय होने लगा, जिसे वे शैलीगत 'अमूर्तनÓ का उत्स भारत में ही सदियों से देखने और बताने लगे। यह काम अब भी उसी तरह जारी है।
कला है चंचला नहीं
हम सब जानते हैं कि आदर्श स्थिति यही होती है कि कला 'तात्कालिकताÓ के समक्ष कहीं अपना सर्वस्व ही समर्पित न कर बैठे। ऐसे समर्पण से इंकार का अर्थ 'शाश्वतताÓ से है और शाश्वतता, पूंजी के प्रवाह में विघ्न की तरह पहचानी जाती है। क्योंकि पूंजी की प्रकृति ही यही है कि वह चंचल से साहचर्य बनाती है। कहना न होगा कि कला को इतनी 'चंचलाÓ नहीं बनाया जा सकता, अन्यथा वह 'मौद्रिकÓ रूप धारण कर लेगी। और मुद्रा का रूप धारण करते ही वह कला के नियम और नैतिकताओं को त्याग कर बाजार के साथ हो लेगी। अब यह सर्वविदित है कि कला अपनी इसी चंचला-वृत्ति को अपना कर अब एक निवेश बन चुकी है।
भारतीय सौंदर्य दृष्टि खारिज
निश्चय ही चित्रकला में तीव्र प्रविधिजन्य-परिवर्तन 'अमूर्तनÓ के आग्रह के चलते आया। 'अमूर्तनÓ ने कला में केवल कला-सामग्री के प्रभाव-वैचित्र्य को कला के प्रमुख प्रतिमान का पर्याय बना दिया। परिणामस्वरूप जो कोई चित्रकार कुछ भी ऊटपटांग करने लगता, कला आलोचक उसके काम का स्वागत करने लगे। अगर स्वाधीनता के कुछेक दशक पूर्व और पश्चात के कला-विवेचनों को देखें तो वहां हमें अपनी 'समझ के अहं से सुलगतीÓ समीक्षाओं ने परंपरा से लगभग प्रतिशोध के स्तर पर मुठभेड़ करते हुए, भारतीय सौंदर्य दृष्टि को खारिज करते हुए, उसे हाशिये पर धकेलना शुरू कर दिया था। जो 'क्लैसिकलÓ था, उसे अतीत का उच्छिष्ट बताया जाने लगा। धीरे-धीरे शीतयुद्ध कालीन दैत्याकार दारुणताओं ने सुंदर की संभावना का संहार कर डाला।
कलाकार क्यों नहीं बोलता
आखिर परंपरागत चित्र-शैलियों की ऐसी दुर्गति की वजहें क्या हैं? दरअसल, हकीकत यह है कि हमारे यहां चित्रकला पर बोलने-बतियाने का काम खुद कलाकारों की जमात ने कम ही किया। इसके विपरीत बढ़-चढ़ कर बोलने वाले स्वनियुक्त गैर-कलाकार ही अधिक रहे। उनमें अधिकतर वे लोग थे, जिन्होंने जीवन में कभी ब्रश नहीं उठाया होगा। वास्तव में, वे अपनी भाषा की पूंजी के सहारे जो शब्द-निवेश कर रहे थे, वही कला-समीक्षा का पर्याय बनता रहा था। उनमें कला की शून्य समझ थी। हां, बाद में जो कलाकारों की पीढ़ी आई, उनमें सूज़ा जैसे कुछेक चित्रकार बोलने-लिखने में सक्षम रहे। लेकिन, ऐसे मुखर कलाकार की कला की सारी महानता या उत्कृष्टता सिर्फ  उनके बोले हुए में थी- जबकि कैनवस पर वे अपनी पंगु कृतियों के साथ थे।
धुंध में एक रौशनी
देखा जाए तो भारत को अगर अपनी 'आधुनिकताÓ ईजाद करनी थी तो पिछली सदी के पूर्वार्ध में एक खिड़की खुल रही थी। वह पगडंडी थी, जो अपने विकास में विस्तृत मार्ग का रूप ले सकती थी। आजादी के बाद वही एक वृहद संभावना थी। यह था, भारतीय कला-क्षितिज पर अमृता शेरगिल का उदय। जब अमृता शेरगिल आर्इं, वह भारतीय कला में 'कृतिÓ के भीतर के संरचनागत परिवर्तन का आरंभिक काल था। उसमें परंपरा के प्रति वैमनस्य की प्रतीति नहीं, बल्कि पुरानी की उपस्थिति पर कृतज्ञता व्यक्त हो रही थी। तब पश्चिम प्रेरित नए ने यथोचित जगह नहीं घेरी या बनाई थी। एक धुंध थी, रचनात्मक छटपटाहट थी और अनेक अनुत्तरित प्रश्न थे, जिनके उत्तर 'कृतिÓ के रूप में कैनवस पर लिखे और दिए जाने थे।
अपनी पश्चिम की पृष्ठभूमि को लांघ कर आई अमृता शेरगिल संभवत: भारतीय कला की उस कलावधि में प्रकट होने वाली पहली ऐसी और एकमात्र चित्रकार थीं, जो अपनी कला के पक्ष में रंग और शब्द, दोनों के सहारे यथोचित बहस कर और यूरोपीय कला-जगत से छन-छन कर आने वाली प्रवृत्तियों से निर्भीकता के साथ रूबरू हुर्इं। क्योंकि वे वहां के कला आंदोलनों की हलचलों की साक्षी थीं और हकीकतों को खंगाल चुकी थीं। इसलिए उन्होंने पश्चिम से लौट कर 'भारतीय कलाÓ को लेकर उठाए जाते रहे पुराने प्रश्नों के ज्यादा तर्कपूर्ण उत्तर अपनी रचनात्मकता के रूप में दिए। उन्होंने पिकासो की तर्ज पर 'विरूपनÓ या 'विकृतिÓ को आधार नहीं बनाया, बल्कि यह अपनी मेधा से सिद्ध किया कि भारतीय चित्र-दृष्टि का असली मर्म 'देखनेÓ भर में नहीं, बल्कि देख चुकने के बाद उसकी ऐंद्रिकता को सात्विकता के साथ नाथने में भी है।
ऐंद्रीय-आध्यात्मिकता
उनकी देहाकृतियों को विवेचित करने के लिए एक शब्द का उपयोग किया जा सकता है- ऐंद्रीय-आध्यात्मिकता। भारतीय चित्र-शैलियों पर चित्रित या उत्कीर्ण स्त्रीदेह में यही विशिष्टता समाहित है। वह तूलिका से चित्रित या छैनी से तराशी हुई नहीं, बल्कि काव्य-भाषा में आपादमस्तक लथपथ देह है। उसमें स्थूल ऐंद्रिकता नहीं, एक किस्म की 'ऐंद्रीय-आध्यात्मिकताÓ है। संस्कृत में इसे 'चिंतामणिÓ देह कहा गया है, जिसे पाकर भी अप्राप्यता का बोध मिटता नहीं है। क्या सूज़ा की निहायत फूहड़ और भदेस निर्वसनाओं को 'भारतीय कला दृष्टिÓ की अप्रतिम उपलब्धि की तरह अभिनंदनीय बनाया जाना चाहिए?
सवाल है कि क्या हम अपनी कला-परंपरा की खोई हुई पहचान को पुनराविष्कृत करते हुए, तथाकथित ग्लोबल के सच्चे प्रतिरोध का कोई प्रतिमान गढ़ सकते हैं? या कि बस भूमंडलीकृत बाजार के बाजे में फूंक मार-मार कर, अपनी उधारी की तुरही से उनके सुर में सुर मिलाते रहने को 'यह तो होना ही हैÓ की-सी अनिवार्य नियति स्वीकार कर लेंगे।     -प्रभु जोशी
लेखक के बारे में
Prabhu Joshi
जीवविज्ञान में स्नातक तथा रसायन विज्ञान में स्नातकोत्तर के उपरांत अंग्रेज़ी साहित्य में भी प्रथम श्रेणी में एम.ए. किया बड़े अखबारों में बरसो तक संपादकीय तथा फ़ीचर पृष्ठों का संपादन। बचपन से चित्रकारी करते हैं। जलरंग में विशेष रुचि। लिंसिस्टोन तथा हरबर्ट में आस्ट्रेलिया के त्रिनाले में चित्र प्रदर्शित। गैलरी फॉर केलिफोर्निया (यू.एस.ए.) का जलरंग हेतु थामस मोरान अवार्ड। ट्वेंटी फस्र्ट सेन्चरी गैलरी, न्यूयार्क के टॉप सेवैंटी में शामिल। भारत भवन का चित्रकला तथा म. प्र. साहित्य परिषद का अखिल भारतीय सम्मान।

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

18वें कला मेला की तैयारियां

राजस्थान ललित कला अकादमी 
के 18वें कला मेला की तैयारियां
स्टेंडर्ड, एक्टिविटिज सब पहले से ज्यादा
सेमीनार और वर्कशॉप 
मूमल नेटवर्क, जयपुर। राजस्थान ललित कला अकादमी की ओर से राजधानी जयपुर में आयोजित होने वाले 18वें कला मेले की तैयारियां परवान पर हैं। इस बार कला मेले का आकार बढ़ाते हुए स्तर और गतिविधियां और बढ़ाए जाने की योजना है।
जयपुर के जवाहर कला केंद्र के शिल्पग्राम में 12 से 16 मार्च तक होने कला मेले के लिए इस बार जेकेके की चार प्रमुख कला दीर्घाएं भी बुक कराई गई हैं।
प्रदेश की समसामयिक, पारंपरिक सृजनात्मक कलाओं को एक ही स्थान पर संगठित रूप से प्रदर्शित करने के लिए इस बार ऊर्जावान युवाओं और वरिष्ठ कलाकारों के काम को प्रमुखता दिए जाने का प्रस्ताव है। कला मेले को और अधिक विस्तृत स्वरूप देने के लिए प्रदेश की विभिन्न कला अकादमियों, महाविद्यालयों, कला संगठनों और विभागों की भागीदारी सुनिश्चित किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस बार अखिल भारतीय सेमीनार और आर्ट कैंप जैसी गतिविधियों को आयोजन से जोड़ा जाएगा।
उल्लेखनीय है इस आयोजन में जेकेके की सहभागिता प्रमुख है। यहां की चातुर्दिक कलादीर्घा में जहां आर्ट कैंप आयोजित होगा वहीं तीन अन्य दीर्घाओं में वरिष्ट कलाकारों की कलाकृतियां प्रदर्शित की जाएंगी।
ये देंगे आयोजन को आकार
अकादमी के 18वें कला मेले के लिए प्रस्तावित कार्यक्रमों को साकार रूप देने के लिए सचिव अनीता मीना और प्रदर्शनी अधिकारी विनय शर्मा काफी पहले से सक्रीय हैं। कला मेला का संयोजक समंदर सिह खंगारोत 'सागर' को मनोनीत किया गया है। शेष आयोजन समिति में आर.बी. गौतम, डा. नाथूलाल शर्मा, मीनू श्रीवास्तव, मीनाक्षी भारती कासलीवाल,जगमोहन माथोरिया और युवा कलाकार श्वेत गोयल को शामिल किया गया है।

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

Journey of ANUPAM'S ART from 3rd Jan

Show some works at moomalyatra.blogspot.in

जर्नी ऑफ अनुपम आर्ट 3 जनवरी से जेकेके में
मूमल नेटवर्क, जयपुर।
देश के जाने-पहचाने कलाकार डॉ. अनुपम भटनागर की पेंटिंग्स को लेकर एक शैक्षिक प्रदर्शनी जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में लगाई जा रही है।
मूमल के कला चेतना अभियान के तहत 'जर्नी ऑफ अनुपम आर्ट' के नाम से यह प्रदर्शनी 3 से 5 जनवरी 2015 तक जवाहर कला केन्द्र की सुकृति आर्ट गैलेरी में यह प्रदर्शनी विशेष कर मूमल के 'दर्शक दीर्घा' कॉलम में समय-समय कला प्रेमी पाठकों द्वारा जाहिर जिज्ञासाओं को देखते हुए आयोजित की जा रही है।
इस तीन दिवसीय प्रदर्शनी में डॉ. भटनागर की विभिन्न समय-काल और मूड में बनाए गए चुनिंदा चित्रों का प्रदर्शन किया जा रहा है। इस प्रदर्शनी में तीनों दिन डॉ. भटनागर की कला के अलग-अलग रूप देखने को मिलेगें।
उल्लेखनीय है कि मूमल ने अपने प्रकाशन में दर्शक दीर्घा कॉलम के जरिए हमेशा कला प्रेमियों दर्शकों को प्रोत्साहन देने का काम किया है। किसी कलाकृति को कैसे देखें और किसी कलाकृति की कोई कीमत क्यों होती या नहीं होती है। इस संबंध की विशेष जानकारी और खुला विश्लेषण  'दर्शक दीर्घा' कॉलम में प्रकाशित होता रहा है, अब इसे प्रत्यक्ष रूप से दर्शकों के सामने लाने का सिलसिला आरंभ किया जा है। इसी कड़ी में मूमल द्वारा वरिष्ठ चित्रकार डॉ. अनुपम भटनागर के चित्रों का एकल प्रदर्शन किया जा रहा है।
See More for works of Dr. Anupam Bhatnagar 

बुधवार, 5 नवंबर 2014

Jaipur Art Summit 2014, Seminar.

सेमीनार शुल्क दो नहीं, एक हजार रुपए
मूमल नेटवर्क, जयपुर। जयपुर आर्ट समिट 2014 के तहत आयोजित दो दिवसीय सेमीनार में भाग लेने का शुल्क एक हजार रुपए ही है, पूर्व में यह दो हजार रुपए प्रचारित हुआ था।
समिट सूत्रों ने इसे स्पस्ट करते हुए बताया कि सेमीनार में शामिल होने के लिए पिछले वर्ष की तरह एक हजार रुपए शुल्क ही लिया जा रहा है। इस शुल्क में सेमीनार वाले दो दिनों के दौरान पढ़े जाने वाले पेपर्स का फोल्डर और इन दो दिनों का लंच शामिल हैं। इसके अलावा पिछले साल समिट के पहले संस्करण का कैटेलॉग लिए जाने पर 500 रुपए और इस साल के द्वितीय संस्करण का कैटेलॉग लिए जाने पर 500 रुपए और जमा कराने होंगे। यह नहीं लेने पर सेमीनार का शुल्क एक हजार रुपए ही होगा।
कला फिल्मों का प्रदर्शन
समिट के व्यस्त कार्यक्रम में दो दिन में कम से कम आठ कला फिल्मों के प्रदर्शन शामिल किए गए हैं। इनके लिए 17 और 18 नवम्बर के दिन तय किए गए हैं।
समिट टीम के सदस्य आर.बी. गौतम ने बताया कि इन फिल्मों के चयन में यह खास बात होगी कि सभी फिल्में स्वयं कलाकारों द्वारा बनाई गई है। इनमें पहले दिन 17 नवम्बर को दिखाई जाने वाली फिल्में वह होंगी जो कलाकारों द्वारा स्वयं की कला के बारे में सोच को स्पस्ट करती हैं। इनमें वरिष्ठ चित्रकार गोपी गजवानी, श्रीधर अय्यर, आर.एम. पाकिस्तान के नईम  और दोहा के आबू अलिंगा की फिल्में शामिल हैं।
दूसरे दिन 18 नवम्बर को कलाकारों द्वारा अन्य कलाकारों पर बनाई फिल्में शामिल की गई हैं। गोपी गजवानी द्वारा एस.एच. रजा और के. विक्रम सिंह द्वारा अमित्व दास पर बनाई फिल्मों के साथ धीरज चौधरी पर बनी फिल्म भी कला प्रेमी देख सकेंगे।