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मंगलवार, 12 जून 2018

यादों में जीवित सुरेन्द्र पाल जोशी

यादों में जीवित सुरेन्द्र पाल जोशी
कला जगत में कभी भी ना भर सकने वाले अपने स्थान को रीता छोड़ कर देश के प्रख्यात चित्रकार जोशी ने इस दुनिया से विदा ली। सुरेन्द्र पाल जोशी के जाने का दुख जितना उनके परिवार जनों को रहेगा उतना ही उनके करीबी मित्रों व पूरे कला जगत को भी। अपनी कला के साथ, ठसक व स्वाभिमान के लिए पहचाने जाने वाले जोशी ने विदा होने से पहले कला जगत के लिए अमूल्य विरासत छोड़ी है।
कुछ लेने नहीं बल्कि बहुत कुछ देने की ईश्वरीय सौगात लिए इस कलाकार का जन्म 1955 में देहरादून के मनियारवाला (गुनियालगांव) गांव में हुआ। कला के अंकुर स्कूली जीवन में ही नजर आने लगे थे। ऋषिकेश से बीए करने के बाद 1980 में लखनऊ के आट्र्स एंड क्राफ्ट्स कॉलेज में दाखिला ले लिया। और...फिर यहां से कला का जो सफर शुरू हुआ, वह कला जगत में नए कीर्तिमान स्थापित करता चला गया।
जोशी की साधना के शुरुआती साल बेहद गर्दिशभरे रहे लेकिन उनकी जीवटता ने जीत हासिल की। ...और उतरांचल के इस कलाकार ने राजस्थान को अपनी कर्मभूमि के रूप में चुनते हुए 1988 में राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट, जयपुर की फाइन आर्ट फैकल्टी के सहायक प्राध्यापक पद को ज्वाइन किया।
मूमल से जोशी जी का पहला परिचय राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट में सन् 2006 में हुआ जो 2013 के जयपर आर्ट समिट के पहले एडीशन के साथ गहरा हुआ। बहुत ही धीमें से अपनी बात रखना उनके स्वभाव में शामिल था। अपनी कला यात्रा के बारे में मूमल से उनकी अक्सर बात हुआ करती थी। उन्होंने बताया था कि, म्यूरल बनाने का मुझे शौक था और उस श्रप में पहचान भी मिली। आइओसी दिल्ली, यूनी लिवर मुबंई, शिपिंग कॉर्पोरेशन विशाखापत्तनम आदि स्थानों पर म्यूरल बनाए। वर्ष 1997 में ब्रिटेन से फैलोशिप मिलने के बाद वहां भी म्यूरल पर कार्य किया। लेकिन, वर्ष 2000 के बाद मैंने सिर्फ पेंटिंग पर ध्यान देना शुरू कर दिया। पेंटिंग में कई नए-नए प्रयोग किए और कई देशों में इसके लिए सम्मान भी मिला।
कलाकार के मन की उड़ान उन्हें बंधनों से आजाद होने की प्रेरणा देती रही और 2008 में राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट से सेवा निवृति लेकर पूरी तरहा से कला साधना में जुट गए। शिक्षक रहते हुए ही नव कलाकारों के लिए उनके मन में कई खयाल आते- जाते रहते थे। परिणाम के रूप में कुछ साल पहले अपना श्रम और धन लगाकर उतराखण्ड सरकार के सहयोग से अपनी जन्मभूमि देहरादून में पहले राजकीय कला संग्रहालय की स्थापना की। मूमल को अपने अपने की बात साझा करते हुए उन्होंने कहा था कि, यह संग्राहलय और गैलेरी प्रदेश के कला साधकों के लिए एक बेहतर मंच साबित होगा। इस संग्राहलय के बनने के साथ ही जोशी देश के ऐसे पहले कलाकार बन गए जिनके जीवित रहते उनकी कला को स्थायी रूप से प्रदर्शित करता हुआ राजकीय संग्राहलय देश को समर्पित हुआ।
जोशी की कला यात्रा केवल म्यूरल्स व पेंटिंग तक ही सिमटी नहीं रही। उन्होंनें एक लाख सेफ्टीपिन से बना हैलीकॉप्टर, 70 हजार सेफ्टीपिन से बना हैलमेट, फिल्म स्ट्रिप से बना आर्कीटेक्चर स्ट्रेक्चर बनाकर कला प्रेमियों का मन मोह लिया। समाज व देश के प्रति संवेदा के चलते उन्होंनें फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा। इस वर्ष की शुरुआत यानि जनवरी के प्रथम सप्ताह में जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में उनके द्वारा निर्मित वृतचित्र पहाडग़ाथा की स्क्रिनिंग की गई। इस वृत चित्र में केदार घाटी में आई भीषण बाढ़, उससे जूझते लोग एवं बचाव व राहत कार्य को बहुत ही कलात्मक तरीके से फिल्माया गया था। इतनी सारी विधाओं पर एक साथ कार्य करने के तालमेल पर हुई एक वार्ता के दौरान जोशी जी ने मूमल से कहा था कि, विधा में बदलाव जोखिमपूर्ण जरूर है, किन्तु यदि इसे चुनौती मानते हुए पूरा अभ्यास किया जाए तो सफलता जरूर मिलती है।
अपनी कला के दम पर उन्होंने एशियन कल्चरल सेंटर फॉर यूनेस्को, (जापान), ऑल इंडिया अवार्ड, राजस्थान ललित कला ऐकेडमी, फैलोशिप फॉर म्यूरल डिजाइन बाई द ब्रिटिश ऑट्र्स काउंसिल, नेशनल अवार्ड, ललित कला ऐकेडमी (नई दिल्ली), राजीव गांधी एक्सीलेंस अवार्ड (नई दिल्ली), गोल्ड मेडल यूनेस्को आदि जैसे कई पुरस्कार व सम्मान हासिल किए।
सम्मान, सफलता व जोखिम को अपना साथी मानने वाला यह कलाकार आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी कलाकृतियों के साथ उनकी यादों का सिलसिला हमेशा हमारे बीच उनकी मौजूदगी के एहसास को बनाए रखेगा।          -राहुल सेन



गुरुवार, 31 मई 2018

तार-तार हुआ खुद्दार कलाकार का सम्मान

तार-तार हुआ खुद्दार कलाकार का सम्मान
सुरेन्द्र पाल जोशी, कला जगत में अपनी खुद्दारी के लिए जाना-पहचाना नाम, एक ऐसा समर्पित कलाकार जिसने कला व कलाजगत के लिए अपनी  जमा-पूंजी का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी प्रचार के खर्च कर डाला। आज वह स्वाभिमानी कलाकार ललित कला अकादमी द्वारा उनकी बीमारी के चलते एक लाख रुपए का अनुदान दिए जाने के प्रचार के कारण चर्चा में है।
सुरेन्द्र पाल जोशी पिछले कुछ बरसों से गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं, लेकिन अपनी खुद्दारी के चलते कुछ निकट सम्बन्धियों के अलावा किसी को इसकी जानकारी नहीं होने दी। अपने संचित धन से इलाज कराते रहे। संचय भी इतना कि इलाज के दौरान ही उत्तराखंड में एक गैलेरी की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान करते रहे। इसी दौरान अपनी पुत्री का अच्छे स्तर पर विवाह सम्पन्न किया। पिछले कुछ महीनों में बीमारी ने जब अपना विकराल रूप दिखाया तो बड़े नामी अस्पतालों के कई-कई लाख रुपए के बिल भी चुकाए। पिछले कुछ दिनों से वे जयपुर के एक नामी अस्पताल में भर्ती हैं। जाहिर है, ऐसे हालात में तो धन्ना सेठों के खजाने भी खाली हो जाते हैं, फिर एक कलाकार तो.....
ऐसे में राजस्थान ललित कला अकादमी ने एक संवेदनशील कदम उठाते हुए सुरेन्द्र पाल जोशी की सहायता के लिए एक लाख रुपए की सहायता राशि जारी की। अकादमी के अध्यक्ष और नवनियुक्त सचिव ने जोशी के परिजनों को सहायता राशि का चैक सौंपा। यहां तक सब कुछ सामान्य और सहज था, लेकिन उसके बाद जो हुआ... वह जीवन और मृत्यु के बीच जूझ रहे इस खुद्दार कलाकार के लिए बिलकुल असहज रहा।
कला जगत के कुछ अतिउत्साही कलाकारों ने अकादमी की इस सहायता का सामान्य से कहीं अधिक प्रचार किया। अखबारों में बड़े आकार का समाचार प्रकाशित कराया गया। उसके बाद उसे और प्रचारित करने का बीड़ा सोशल मीडिया के खिलाडिय़ों ने उठा लिया। कला जगत के जानकार कहते हैं कि अकादमी की ओर से इससे पूर्व भी अनेक अवसरों पर जरूरतमंद कलाकारों की सहायता की गई है, लेकिन इतना प्रचार पहले कभी नहीं देखा। वह तो शुक्र है कि सुरेन्द्र पाल जोशी पूरी तरह होश में नहीं हैं और सहायता के इस प्रचार से अनभिज्ञ हैं। यदि उन्हें इसका ज्ञान होता तो उनके लिए यह कष्ट कितना पीड़ादायक होता इसका अनुमान कोई भी संवेदनशील इंसान लगा सकता है।
राजस्थान के कला जगत की नयी पौध को संभवत इस स्वाभिमानी कलाकार के बारे में ज्यादा जानकारी ना हो, लेकिन इनके संगी साथी रहे मूर्धन्य कलाकार अपने साथी के स्वभाव से भली भांति परीचित हैं। असामान्य यह है कि उनके नाम भी समाचारों व तस्वीरों में शामिल हैं। अकादमी के कोष से सहायता राशि प्रदान करने वालों को श्रेय देने की होड़ में कुछ लोग क्या कर रहे हैं, वे स्वयं नहीं जानते... ईश्वर उन्हें क्षमा करे।

एक परिचय
उत्तराखण्ड में जन्में जोशी ने राजस्थान को अपनी कर्मभूमि बनाया। कला शिक्षक के रूप में कई विद्यार्थियों को अपने जीवन लक्ष्य तक पहु्रचाया। वक्त आया तो पूरी निष्ठा और समर्पणता के साथ जन्म भूमि का ऋण भी चुकाया। जोशी ने अपना कीमती समय, श्रम व धन देकर राज्य सरकार के सहयोग से देहरादून में प्रदेश की पहली आर्ट गैलेरी की स्थापना की। म्यूरलव फ्रेस्कों आर्टिस्ट के रूप में ख्यात जोशी ने इंस्टालेशन की दुनिया में भी खूब रंग जमाया।
जोशी की खास कृतियों में एक लाख सेफ्टीपिन से बना हैलीकॉप्टर, 70 हजार सेफ्टीपिन से बना हैलमेट, फिल्म स्ट्रिप से बना आर्कीटेक्चर स्ट्रेक्चर खासे चर्चित रहे हैं। अभी कुछ अर्सा पहले महंगी व भव्य काफी टेबिल बुक लांच की। जीवन भर आत्म सम्मान और ठसक जिनके चारित्रिक गुण रहे। कला जगत में जितना यश कमाया उतना ही धन भी। किसी से कभी कुछ मांगा नहीं अलबत्ता दिया जरूर।
दिसम्बर 2017 से सुरेन्द्र पाल जोशी के स्वास्थ्य की हालत नाजुक है। इसकी जानकारी उत्तराखण्ड के कलाकारों को भी है और मीडिया को भी। प्रचार से दूर वहां केवल जोशी जी के शीघ्र स्वस्थ होने की चुपचाम प्रार्थनाएं की जा रही हैं।