सोमवार, 16 जून 2014

MOOMAL June-2

सुधि पाठक,
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गुरुवार, 12 जून 2014

केशव मलिक का निधन...एक खामोश अवसान

कला समीक्षक केशव मलिक का निधन


मूमल नेटवर्क, नई दिल्ली। वरिष्ठ कला समीक्षक, संपादक व कवि पद्मश्री केशव मलिक अब हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने 10 जून, 2014 को देर रात दिल्ली में अंतिम सांस ली, वे 90 वर्ष के थे।रात को उन्हें दिल का दौरा पडऩे के बाद उनके परिजन उन्हें गंगाराम अस्पताल में ले गए, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। 11 जून की शाम लोधी रोड स्थित श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार हुआ।
अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में 5 नवंबर 1924 को जन्में केशव मलिक की प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली और कलकत्ता में हुई। अमर सिंह कॉलेज श्रीनगर, कश्मीर से 1945 में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1947-48 में उन्हें जवाहर नेहरू के निजी सचिव के तौर पर काम करने का अवसर मिला। बाद के वर्षों में उच्च शिक्षा के लिए 1950-58 तक लगातार यूरोप और अमरीका की यात्राएं की। भारत लौटने के बाद साल 1960 से लगातार कलासमीक्षक के तौर पर अखबारों एवं पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन व संपादन से जुड़े रहे।
एक खामोश अवसान
केशव मलिक नहीं रहे यह सुन कर झटका लगा। हालांकि पिछले काफी समय से वे अस्वस्थ चल रहे थे फिर भी जब कोई उन्हें प्रदर्शनी उद्घाटन के लिये बुलाता था, वे आ जाते थे। हर कला आयोजन में उनकी उपस्थिति चाहने वालों से लेकर अपने केटेलॉग में उनके विचार की दो लाइनें शामिल कराने को महीनों उनकी खुशामद करने वालों की भीड़ में इस व्यक्तित्व का एक खामोश अवसान चौकाने वाला रहा।
इसमें कोई शक नहीं कि उनके जैसे कला आलोचक कम ही होते हैं। वे एक कवि भी थे, यह बात तो लगभग सभी जानते हैं परन्तु वे चित्रकार भी थे, यह बात कम ही लोगों को पता होगी। पत्रकारों के लिए उनसे बातचीत करना हमेशा सुखद रहता था। चाहे वह प्रदर्शनी में हो या उनके घर पर। उनसे कला की दुनिया और कला आलोचना की स्थिति को लेकर उनके पास एक लम्बा अनुभव था। वे कला आलोचना की स्थिति को लेकर बहुत खुश नहीं थे, क्योंकि समाचार पत्रों ने अपने यहां कला समीक्षा के लिये जगह खत्म कर दी। एक आलोचक के रूप में कैसे किसी कृति को देखा जाए इसको लेकर 'मूमल' ने एक स्तम्भ भी आरंभ किया। उस समय उन्होंने एक बात कही थी जो अब भी याद है। उन्होंने कहा था कि कला पर लिखने के लिये सिर्फ  कला को देखना ही काफी नहीं है बल्कि उसे जीना भी जरूरी है। उनकी याद हमेशा बनी रहेगी।

केशव मलिक कहते थे कि कलाकार को संवेदनशील होना चाहिए। कला को संवेदना से अलग नहीं किया जा सकता कलाकार की आत्मशुद्धी एक अनिवार्य प्रक्रिया है। कला आपको अध्यात्म की ओर ले जाती है। अत: कलाकार को अपनी संवेदनाओं को आध्यात्म की ओर ले जाना चाहिए। इससे मनुष्य जन्म की सार्थकता प्राप्त होगी। हर समय नया या ओरीजिनल निर्माण करना, या करने की सोचना यह मात्र एक भ्रम होता है। अत: कार्य एवं प्रक्रिया पर ही कलाकार ने ध्यान देना चाहिए। इस प्रक्रिया को आत्मशुद्धि की प्रक्रिया बनाना चाहिए। अध्यात्म के सिवाय कला एक कारीगरी हो सकती है। उससे कलाकार कारीगर बन सकता है कलाकार नहीं। 

मंगलवार, 3 जून 2014

Art Market आर्ट मार्केट में भी बिजनेस स्टंट


आर्ट वल्र्ड में एक बार फिर बूम है। रिसेशन के बाद आर्ट मार्केट ने उबरने में बेशक समय लिया, लेकिन सिचुएशन ज्यादा अच्छी हो गई। गैलरीज़ में भीड़ जुट रही है और इसीलिये, रिसेशन में कदम पीछे खींचने वाले आर्टिस्ट अपना काम निकाल रहे हैं। भरपूर काम है उनके पास, पैसा भी खूब मिल रहा है। पैसा ही इस दुनिया में सक्सेस का पैमाना है। प्रोफेशनल होकर बात की जाए तो करोड़ का आंकड़ा छूने वाले आर्टिस्ट यहां सबसे सक्सेसफुल है। लाख और हजार में अपनी कला की कीमत पाने वाले सेकेंड और थर्ड। 
कई तरह के एडवांस टूल 
ऊपर से बेहद छोटी सी दिखने वाली कला की दुनिया असल में बहुत बड़ी है और इतना ही बड़ा है आर्ट मार्केट। करोड़ों डॉलर्स का है इसका आकार और यह पूरी दुनिया में फैला है। बहुत कम लोग जानते होंगे कि अन्य बाजारों की तरह आर्ट मार्केट में भी बिजनेस स्टंट अपनाए जाते हैं। अन्य बाजारों की तरह यहां भी इंटरनेट जैसे एडवांस टूल यूज होते हैं। गैलरीज में आर्ट एग्जीबिशन से भी कमाई होती है। आर्टिस्ट भी अन्य बिजनेसमैन्स की तरह मार्केट पर नजर रखते हैं और स्टेटजी अपनाते हैं। सीधे खरीदने वाले बायर्स के अलावा उन तक आर्ट पहुंचाने वाले मीडिएटर्स भी होते हैं जो सेल में कुछ हिस्सा लेते हैं।
कीमत से तय होता है कद
ऐसे में यह सवाल उठता है कि कला का मूल उद्देश्य क्या पैसा है? बिल्कुल नहीं, लेकिन आर्टिस्ट को भी तो जीना है। खास बात यह है कि आर्टिस्ट का कद उसकी कला की कीमत से होता है। हालांकि आज भी कई आर्टिस्ट पैसा कमाने के लिए नहीं बल्कि सैटिस्फैक्शन पाने को कला सृजन करते हैं पर मोस्टली इस विचार पर चलते हैं कि जीना है तो पैसा कमाना है और समझदारी से ज्यादा कमाई हो जाए तो इसमें हर्ज क्या है? फिर पेंटिंग की कॉस्ट से ही कद मापा जा रहा है तो यह सब मजबूरी भी हो
जाता है।
रजा सबसे बड़े आर्टिस्ट
पेंटिंग्स की कीमत से हिसाब से एसएच रजा भारत के सबसे बड़े आर्टिस्ट हैं क्योंकि उनकी सौराष्ट्र टाइटिल वाली पेंटिंग 16 करोड़ 53 लाख में बिकी। एफएन सूजा सेकेंड और तैयब मेहता थर्ड हैं जिनकी पेंटिंग्स 11 करोड़ 25 लाख और आठ करोड़ 20 लाख में बिकी हैं। वूमैन आर्टिस्ट आफ द सेंचुरी अमृता शेरगिल की विलेज सीन 6 करोड़ 90 लाख में खरीदी गई। इंडियन पिकासो कहे जाने वाले मकबूल फि़दा हुसैन का स्थान सातवां है। हुसैन की पेंटिंग बैटल बिटवीन गंगा एंड यमुना: महाभारत की कीमत 6 करोड़ 50 लाख मिली है। इसी नजर से भारती खेर, वीएस गायतोंडे, सुबोध गुप्ता और जहांगीर सबावाला भी बड़े कलाकार हैं। यह सब टॉप टेन में हैं। सबावाला की एक पेंटिंग जून 2010 में एक करोड़ 17 लाख में बिकी है, रजा की सौराष्ट्र को भी पिछले ही दिनों 16 करोड़ 73 लाख में बेचा गया। दोबारा बिक्री में 20 लाख अधिक मिले, इसलिये लोगों के लिए आर्ट आइटम्स खरीदना इन्वेस्टमेंट और बिजनेस भी है। कीमत के हिसाब से इंडिया के टॉप 25 आर्ट आइटम्स इन्हीं कलाकारों के हैं।
इंटरनेट का जमाना है 
कला की दुनिया में भी इंटरनेट का जमाना है इसलिये ही तो सूजा और सबावाला की आर्ट को करोड़ों की कीमत आनलाइन सेल से मिली है। इसी का रिजल्ट है कि एक आनलाइन सेल में चार करोड़ 20 लाख के आफर तो सिर्फ ब्लैकबेरी और आईफोन्स के जरिए मिले। रिसेशन के झटके से उबरने के बाद आर्ट वल्र्ड में रौनक लौट चुकी है। गैलरीज फिर आर्ट वर्क से सज रही हैं। नहीं तो, मुंबई की फेमस जहांगीर आर्ट गैलरी में भी भीड़ छंट गई थी। लंबे इंतजार के बाद एग्जीबिशन का मौका मिलने के बाद भी तमाम कलाकार वहां नहीं पहुंचे थे। जो पहुंचे, वो खाली हाथ लौट आए। यह समय उनके डंप हुए आर्ट वर्क के बिकने का है।


रविवार, 1 जून 2014

इतिहास हुई ऐतिहासिक इमारत


राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट का नया भवन अब 'शिक्षा संकुल' में
राजस्थान का सबसे पुराना कला संस्थान राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट अब नए भवन में शिफ्ट होने जा रहा है। विद्यार्थी व शिक्षक अब 2014-15 के नए सत्र के साथ अपना शिक्षण प्रशिक्षण शिक्षा संकुल स्थित कॉलेज की नई बिल्डिंग में करेंगे।
जयपुर दरबार महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय के संरक्षण में 1857 में आरम्भ हुए संस्थान का यह भवन आज विश्व भर में राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट के नाम से अपनी पहचान बना चुका है।
कॉलेज के नए भवन को कला शिक्षण के आधुनिक उपकरणें से सजाने का काम कॉलेज के वरिष्ठ व अनुभवी सदस्यों को सौंपा गया है। बेसमेंट को मिलाकर कॉलेज की बिल्डिंग का पांच मंजिला निमार्ण में कक्षाओं के साथ पेंटिंग्स, स्क्लपचर व आर्ट स्टोर, आर्ट गैलेरीज, कम्प्यूटर लैब, लायब्रेरी व कॉन्फै्रन्स रूम के साथ ग्राफिक, स्क्लपचर व पेंटिंग स्टूडियोज का निमार्ण किया गया है। यह सभी स्टूडियोज व लैब कला के आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित रहेगे। इसके साथ ही मूर्तिशिल्प का अभ्यास करने के लिए कॉलेज से सटा खुला मैदान भी विद्यार्थियों को आकर्षित करेगा। खुले व शोर शराबे रहित वातावरण में कला अभ्यास के प्रति विद्यार्थी अपना ध्यान केन्द्रित कर पाएंगे।
कलाकारी, कारोबारियों की?   
एक इतिहास का हाथ से यूं फिसल जाना बहुत दुखद है। इससे भी ज्यादा दुख की बात यह है कि भवन खाली होने की चर्चा के साथ ही ऐसे मौकों की तलाश में लगे रहने वाले कई व्यावसायिक लोगों की नजरें इस हवेली पर हैं। इनमें कला के वे बड़े कारोबारी भी शामिल हैं जो मौकों की तलाश नहीं करते, बल्कि ऐसे मौकों की रचना करते और कराते हैं। उल्लेखनीय है कि कुछ वर्ष पहले आमेर की कई कलात्मक, ऐतिहासिक और बहुमूल्य हवेलियां, यहां तक कि महल के हिस्से तक निजी कारोबारियों के हाथों में सौंप दिए गए।
बात कहां से उठी?
अब राजस्थान स्कूल आफ  आर्ट का इस अनमोल भवन के भी किसी  निजी स्वामित्व में जाने के कयास लगाए जा रहे हैं। सरकार तो आर्ट स्कूल को भवन के बदले भवन देकर अपना दायित्व पूरा कर चुकी है। सब जुगाड़ हो रहा है। लेकिन, कोई यह बताने को तैयार नहीं है कि यह बात कहां से उठी या उठवाई गई कि राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट को नए भवन की जरूरत है...।  इस भवन का वास्तविक मूल्यांकन करवाने की बात भी अभी तक किसी ने भी नहीं की है। एक तरफ जेडीए व पीडब्ल्यूडी भवन पर अपने स्वामित्व के दावे कर रहें हैं, वही दूसरी ओर प.ं शिवदीन का परिवार भवन को पाने की कोशिशों में लगा है। इसे पाने की लाइन में लगे कारोबारियों की लॉबिंग शुरू हो गई है। हालांकि अभी तक कोई खुलकर कोई सामने नहीं आया है। अब देखना यह है कि यह प्राचीन धरोहर किस के नाम होती है?
भवन खुद एक कलाकृति
सबसे बड़ी बात कि तब और अब के पर्यावरण के अनुकूल बना यह भवन छूट जाएगा। जयपुर दरबार के खास दरबारियों में शामिल पं. शिवदीन की यह हवेली जालीदार कलात्मक झरोखों व महराबों से सुसज्जित है। इसमें आज तक इस पुराने भवन में 46-47 डिग्री सेल्सियस की भीषण गर्मी में भी किसी एसी या कूलर की जरूरत नहीं पड़ी। प्रिंसिपल रूम तक में कभी एसी या कृलर नहीं लगा। यहां के कलात्मक झरोखे ठंडी प्राकृतिक हवा के साथ भवन को ठंडा रखने का काम करते रहे। यह बात अलहदा है कि इनके वास्तु या निर्माण तकनीक को समझने की जरूरत किसी ने नहीं महसूस नहीं की।
यही धरी रह जाएगी धरोहर
सरकार द्वारा प्रदत्त नए भवन में जाने के बाद राजस्थान स्कूल ऑफ  आर्ट को अपने ऐतिहासिक भवन के साथ इससे जुड़े अनेक दुर्लभ भित्ति चित्रों से हाथ धोना पड़ेगा। प्राचीन कलात्मक निमार्ण के साथ इस भवन की दीवारों पर कई महान कलाकारों की कृतियां और हस्ताक्षर अंकित हैं। पदमश्री रामगोपाल विजयवर्गीय, स्व. श्री पी.एन.चोयल द्वारा बनाए गए भित्ति चित्रों के साथ तब मोलेला व गुजरात से आए विख्यात कलाकार के बनाए म्युरल से कला क्षेत्र की धरोहर का वह हिस्सा हो गई दीवारें अब यहीं रह जाएंगी। इन्हें चाह कर भी राजस्थान स्कूल ऑफ  आर्ट का प्रशासन नए भवन में साथ नहीं ले जा पाएगा।
उत्साह भी है उदासी भी 
यहां की कलाकृतियों, कला उपकरणों व अन्य सामान को नए भवन तक पहुंचाने के लिए 70 से अधिक ट्रकों की बात कही जा रही है, लेकिन इससे अधिक सौ ट्रक तक सामान हो सकता है। इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि जाने-अनजाने कई चीजें छूट जाएंगी या छोडऩी पड़ेंगी। नए भवन में जाने के लिए कॉलज स्टॉफ और स्टूडेंट्स के मन में उत्साह है, वहीं इस कॉलेज की पहचान बन चुकी पुरानी एतिहासिक इमारत को छोडऩे की मायूसी भी है। कहते हैं कि एक युग की समाप्ति के बाद भी अवशेषों में बीते युग की प्रतिध्वनियां अनन्तकाल तक गूंजती है। जब-जब राजस्थान स्कूल ऑफ  आर्ट का नाम लिया जाएगा तब-तब आर्ट कॉलेज को समर्पित पं. शिवदीन की यह हवेली हर किसी के जहन में कौंधेगी।

इस संस्थान ने देश व दुनिया को कई नामचीन आर्टिस्ट दिए हैं। ना केवल विद्यार्थियों ने बल्कि यहां के शिक्षकों ने भी शीर्ष कलाकारों के रूप में विश्व स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व किया है।
कॉलेज के पुराने विद्यार्थी
पदमश्री रामगोपाल विजयवर्गीय, देवकीनन्दन शर्मा, रूपचन्द जैन, पी.एन. चोयल, सुरेश चन्द राजौरिया, रघुनन्दन शर्मा, आनन्द शर्मा, हरिशंकर गुप्ता और विजय जोशी।
युवा कलाकार
विनय शर्मा, रामकिशन अडिग, श्वेत गोयल, रवीन्द्र शर्मा माइकल, मुकेश शर्मा, लालचन्द मारोठिया, धर्मेन्द्र राठौड़, मनीष शर्मा, गौरीशंकर शर्मा और दीपक खण्डेलवाल।
यहीं के विद्यार्थी अब यहीं के शिक्षक
हरशिव शर्मा, विनोद मैनी, जगमोहन माथोडिय़ा, नरेन्द्र सिंह यादव और देवीलाल वर्मा।
-राहुल सेन

शुक्रवार, 30 मई 2014

मदरसा-ए-हुनरी से राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट तक

Old Building at Kishanpol Bazar, Jaipur

विज्युअल आर्ट के क्षेत्र में नामी कलाकार देने वाली 
राजस्थान की सबसे पुरानी संस्था  
गौरवशाली इतिहास
सन् 1857 में मदरसा-ए-हुनरी के नाम से शुरू हुआ राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट का सफर कला शिक्षण की दुनिया में अनुभव, परिपक्वता, कला अभ्यास और काबिलियत को स्वयं में समेटे हुए है। देश की सबसे पुरानी कला शिक्षण संस्थाओं में से एक है, राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट। यहां शिक्षा प्राप्त विद्यार्थी स्वत: ही कला के गौरवशाली इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं।
ग्रेजुएशन,पोस्ट ग्रेजुएशन
राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट में ग्रेजुएशन व पोस्ट ग्रेजुएशन तक विजुअल आर्ट की शिक्षा दी जाती है। कला के व्यावसायिक शिक्षण की स्नातक व स्नातकोत्तर डिग्री के लिए पेंटिंग, एप्लाइड आर्टस और मूर्तिशिल्प (स्क्लपचर) में से किसी को चुन सकते हैं। ग्रेजुएशन में 20 वर्ष से कम और पोस्ट गे्रजुएशन के लिए 26 वर्ष तक की आयु के विद्यार्थी एडमीशन ले सकते हैं।
अपेक्षाकृत कम शुल्क
कॉलेज में बैचलर डिग्री ऑफ  विजुअल आर्ट में पेंटिंग, एप्लाइड आर्टस व स्क्लपचर के लिए 24-24 सीटें व मास्टर डिग्री ऑफ  विजुअल आर्ट में पेंटिंग, एप्लाइड आर्टस व स्क्लपचर के लिए 12-12 सीटें उपलब्ध हैं। बीवीए की शिक्षण अवधि 4 वर्ष और एमवीए की शिक्षण अवधि 2 वर्ष (चार सैमिस्टर) में हैं। वार्षिक फीस संतुलित व अपेक्षाकृत कम है जो विद्यार्थियों के अभिभावकों पर ज्यादा आर्थिक भार नही डालती। एमवीए में सेल्फ फाइनेंस के रूप में भी एडमीशन लिया जा सकता है।
आधुनिक स्टूडियोज
कला शिक्षण के लिए नवीनतम व अति आधुनिक उपकरणों से सजे स्टूडियोज हैं, जहां  विद्यार्थियों को अभ्यास व शिक्षण में आसानी रहती है। एससी,एसटी व महिला विद्यार्थियों के लिए कॉलेज में विशेष सुविधाएं उपलब्ध हैं। कॉलेज का शैक्षिक वातावरण परिवारिक व सहज है।
अनुभवी शिक्षक
यहां पढ़ाने वाले शिक्षक कला क्षेत्र के वरिष्ठ और अनुभवी अध्यापक हैं। देशभर में उनकी पहचान शिक्षक के साथ-साथ बेहतर कलाकार के रूप में भी है। अनुभवी व परिपक्व शिक्षकों के संरक्षण में विद्यार्थी अपनी प्रतिभा को निखार कर कला की दुनिया में अपनी पहचान बना सकते हैं। देश-विदेश में स्थापित कलाकारों में से अनेक नाम यहां से शिक्षण प्राप्त कर निकले विद्यार्थियों के हैं।
सुसम्पन्न लायब्रेरी 
विषय के गहरे अध्ययन के लिए यहां की लायब्रेरी में बहुमूल्य पुस्तकों का भण्डार है। कला से सम्बन्धित लगभग 8000 पुस्तके कॉलेज की लायब्रेरी में हैं और नवीनतम पुस्तकों की भी नियमित रूप से खरीद होती रहती है।
अब नए भवन में 
इस सत्र से कॉलेज शिक्षा संकुल स्थित नए भवन में शिफ्ट हो रहा है, जो कला शिक्षण के आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित है। कॉलेज में एडमीशन के लिए बीएवी के 2 जून से और एमवीए के लिए14 जून से फार्म उपलब्ध होंगे। यह फार्म व प्रोस्पेक्टस  किशनपोल बाजार स्थित कॉलेज के पुराने भवन से प्राप्त किए जा सकते हैं। भरे हुए फार्म को बीएवी विद्यार्थी द्वारा 19 जून तक और एमवीए विद्यार्थी द्वारा 24 जून तक किशनपोल बाजार वाले पुराने भवन में जमा करवाया जा सकता है।
देखें: राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट 
New building at 'Shiksha Sankul' JLN Road, Jaipur

स्टैनी मैमोरियल पी.जी. कॉलेज,एक बेहतर विकल्प

निजी क्षेत्र में बेहतर कला शिक्षा के लिए जयपुर के स्टैनी मैमोरियल पी.जी. कॉलेज का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। यहां व्यावसायिक शिक्षा के अन्तर्गत बैचलर्स ऑफ  विजुअल आर्ट तथा ड्राइंग एण्ड  पेंटिंग में बी.ए एवं एम.ए के कोर्स चलाए जाते हैं। इसके साथ ही संगीत में बी.ए व बैचलर ऑफ  म्यूजिक के कोर्स चलाए जाते हैंं।
यहां के फाइन आर्ट विभाग में ड्राइंग व पेंटिंग के विद्यार्थियों के लिए अच्छे स्टूडियो उपलब्ध हेँ, जहां विषय की आवश्यक्ता के अनुसार काम किया जा सकता है। कॉलेज में प्रिंटिंग की विभिन्न कलाओं का प्रयोगात्मक प्रशिक्षण देने के लिए उच्च कोटि का प्रिटिंग स्टूडियो भी बनाया गया है। यह स्टूडियो सभी आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित है। विद्यार्थी, कॉलेज द्वारा उपलब्ध उपकरणों के माध्यम से अपने विषय का अभ्यास कर सकते हैं। संगीत की कक्षाओं के लिए कालेज में सभी वाद्य यंत्रों की उपलब्धता है, जिस पर अपनी रुचि और विषय के अनुसार विद्यार्थी नियमित अभ्यास करते हैं।
सर्वांगीण विकास
विद्यार्थियों का कला क्षेत्र में सर्वांगीण विकास हो इसके लिए समय-समय पर सेमीनार, प्रदर्शनियों, कार्यशालाओं व वार्षिक प्रतियोगिताओं का नियमित रूप से आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही यहां के विद्यार्थी पूरे आत्मविश्वास के साथ जेकेके में अपनी बनाई पेंटिंग्स की प्रदर्शनियां भी लगाते है। संगीत के विद्यार्थी भी गुरूजनों की संगत में अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
पारंगत शिक्षक
कला विभाग में अपने क्षेत्र के दक्ष और पारंगत शिक्षकों की नियुक्ति की गई है। इनके सानिध्य में विद्यार्थी पूरी तलीनता और तन्मयता के साथ अपनी कला को साधता है। कालेज प्रशासन द्वारा समय-समय पर वरिष्ठ कलाकारों को आमंत्रित किया जाता है, जो विद्यार्थियों के समक्ष अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं और उन्हें प्रशिक्षित करते हैं। छात्राओं के लिए यहां का वातावरण सहज व सुरक्षित है। इसे बनाए रखने के लिए शिक्षक व प्रशासन पूरी तरहा से प्रतिबद्ध व सजग हैं।
महिलाओं को छूट
कॉलेज की फीस में महिलाओं े लिए विशेष छूट का प्रावधान है। एडमीशन फार्म कालेज के मान सरोवर स्थित भवन में उपलब्ध हैं। इसके अलावा संस्थान की वेबसाइट से भी इसे प्राप्त किया जा सकता है।
See More for Stani Memorial P.G. College

मंगलवार, 27 मई 2014

विजुअल आर्ट अर्थात सफलता का कैनवास

रचनात्मकता प्रस्तुत करने के पारम्परिक व नवीन माध्यमों का कलात्मक मिश्रण, अर्थात अपने विचारों, भावों व संवेदनाओं कों विभिन्न प्रयोगों के द्वारा सरलता से आकर्षक बनाकर प्रस्तुत करना ही तो है, विजुअल आर्ट।  
कुछ वर्ष पहले तक कला संस्थानों में छात्रों का अभाव रहता था। किन्तु वर्तमान में खुले मीडिया व ग्लोबलाइजेशन के कारण आज स्थिति कुछ और ही है। आज अच्छे कला संस्थानों में अच्छे से अच्छे छात्र जो कि वाकई में कुछ रचनात्मक कार्य करना चाहते हैं, उनकी लाइन लगी हुई है। कुछ तो दो साल तक का इन्तजार भी करते हैं। विजुअल आर्ट के इस व्यापक क्षेत्र में विभिन्न शाखाओं के अपने विशेष गुण व उनकी अपनी गम्भीर नवीनतम व रचनात्मक उपयोगिता है।  
इसके अन्र्तगत प्रमुखत : पेटिंग, चित्रकला, ग्राफिक्स (प्रिन्टमेकिंग), म्यूरल, टेक्सटाइल कला. एप्लाइड आर्ट यानि व्यावहारिक कला/ कमर्शियल आर्ट, इलस्ट्रेशन, एनिमेशन, टाइपोग्राफी, फोटोग्राफी, छपाई कला, प्लास्टिक आर्ट, स्कल्पचर या मूर्तिकला, पॉटरी, इस विषय से संबंधित कला इतिहास व अन्य विषयों का अध्ययन किया जाता है। 
पाठ्यक्रम
सामान्यत: सभी संस्थानों में यह एक चार वर्षीय पाठ्यक्रम है। प्रथम वर्ष में उस संस्थान में विजुअल आट्र्स के सभी पाठ्यक्रम पढाए जाते हैं। उनका अध्ययन करना होता है। जिसे फाउण्डेशन कोर्स कहा जाता है। तत्पश्चात प्राप्तांक व मेरिट के आधार पर अपने विषय का तीन वर्षीय स्पेशलाइजशेन कोर्स करना होता है। इसे बी.एफ..ए. (बैचलर इन फाइन आट्र्स) या बी.वी. ए. (बैचलर इन विजुअल आटर््स) कहते हैं। तत्पश्चात यदि रुचि हो व आपको अपने अध्ययन व कला के क्षेत्र में और नवीन प्रयोगों को भी सीखना हो तो दो वर्षीय पोस्ट ग्रैजुएशन कोर्स जिसे एम.एफ..ए. (मास्टर इन फाइन आट्र्स) या एम.वी.ए. (मास्टर इन विजुअल आटर््स) कहते हैं। इसके अन्र्तगत, निर्देशन में सामान्यत: गाइड सिस्टम के तहत शिक्षण संस्थान में कार्यरत अध्यापकों के रजिस्ट्रेशन कराकर किसी एक या दो विषयों पर काफी गूढ़ व प्रयोगात्मक अध्ययन करना होता है। इसके उपरान्त आप चाहें तो इस विषय में पीएचडी भी कर सकते हैं।
रोजगार के अवसर
सामान्यत: सरकारी या प्राइवेट बी.एफ.ए/बी.वी.ए. करने के बाद आप स्कूली स्तर तक के अच्छे कला शिक्षक, सरकारी संस्थानों में कलाकार व फोटोग्राफर इत्यादि बन सकते हैं। एमएफए/एमवीए/पीएचडी करने के बाद सरकारी व प्राइवेट महाविद्यालय/ विश्वविद्यालयों में कला में शिक्षक भी बन सकते हैं जिसमें आप लेक्चरर/रीडर व प्रोफ़ेसर तक के पदों पर आसीन हो सकते हैं। लेकिन यह एक सामान्य पहलू है। इसका रचनात्मक पहलू स्वतंत्र कलाकार बनने में ज्यादा है। इसके अलावा विज्ञापन संस्थानों/आर्ट गैलेरीज/प्रकाशन के क्षेत्र व फिल्मों के क्षेत्र में/फोटोग्राफी/एनिमेशन फिल्मों इत्यादि में अपार रोजगार उपलब्ध है।
पेंटिंग- (चित्रकला) 

चित्रकला अर्थात पेटिंग बनाने की कला के बारे में सामान्यत: इसे हम बचपन से ही सुनते व कुछ स्तर तक स्कूली स्तर पर सीखते आते हैं लेकिन इस विषय की गम्भीरता व रचनात्मकता की व्यापक जानकारी हमें ग्रेजुएशन/पोस्ट ग्रेजुएशन व रिसर्च के माध्यम से मिलती है। इनकी सहायता से हम इस विधा में पारंगत हो सकते हैं व एक सम्मानजनक उपयोगी रोजगारोन्मुख रचनात्मक जीविका चला सकते हैं। सामान्यत: ग्रेजुएशन के दौरान इसको सीखने के लिए नई सोच, नई तकनीक के साथ-साथ ड्राइंग करने के महत्वपूर्ण ज्ञान का होना जरूरी है। इसकी शुरुआत हमें स्केचिंग जैसी विधा से करनी होती है। इसके उपरान्त मानव शरीर/प्राकृतिक दृश्यों/स्टील लाइफ इत्यादि को चित्रित करने की सुन्दर प्रक्रिया सीखनी होती है। इन्हें हम विभिन्न धरातलों जैसे कई तरह के पेपर व कैनवास पर पारंम्परिक व नवीन माध्यमों जैसे वाटर कलर/तैल रंगों/पोस्टर कलर/चारकोल/पेंसिल इत्यादि की सहायता से चित्रित करने की अनवरत प्रक्रिया की ओर बढ़ते रहते हैं। चार वर्षीय डिग्री कोर्स से ग्रेजुएशन करने के उपरान्त दो वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्सों में चित्रकला के तहत विभिन्न पारम्परिक व नए माध्यमों जैसे कम्प्यूटर तक का उपयोग करके उस पर विस्तृत रूप से अपने विषय अनुसार मूर्त व आमूर्त कला का गम्भीर प्रयोगात्मक अध्ययन किया जाता है।
ग्राफिक्स कला (प्रिंटमेंकिंग) 
यह छपाई कला की प्राचीनतम विधि है, जिसे प्राचीन समय से लेकर आज तक उचित सम्मान मिला है। हम अपनी रचनात्मक कलाओं का प्रदर्शन पारम्परिक तरीके जैसे जिंक की प्लेट/लाइम स्टोन/वुड/कास्ट/लिनेन एवं सिल्क के साथ विभिन्न धरातलों पर उकेर कर मशीन तथा स्याही की सहायता से पेपरों पर प्रिन्ट द्वारा करते हैं। इससे लिए गये प्रिन्टों की संख्या सीमित होती है यह इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। वर्तमान समय में कई नवीन कलाकारों ने इस विषय पर गैर पारम्परिक प्रयोगों के जरिए उच्च कोटि का कार्य करके इसकी प्रामाणिकता को और सिद्ध व जनोपयोगी बनाने का प्रयास किया हैं। इस कला को भी सीखने के लिए ड्राइंग के क्षेत्र में पारंगत होना अति आवश्यक है।
म्यूरल कला 
सामान्यत: इसे दीवारों पर बनाई गई पेटिंग के रूप में समझा जाता है। इस कला को भी सीखने में चित्रकला की तरह ही ड्राइंग के क्षेत्र में पारंगत होना व रंगों का उचित ज्ञान भी होना अति आवश्यक है। वर्तमान में म्यूरल की जरूरत समाज में एक नई पहचान बनाने के तौर पर उभरी है। पुरानी परम्परा यानी रंगों की सहायता से दीवारों पर पेंटिंग बनाने से हटकर सोचने व क्रियान्वित करने के ट्रेंड ने इसे बहुआयामी बना दिया है। अब टाइल्स/ टेराकोटा /सीमेन्ट/ बाल ू/ग्लास/ प्लास्टिक/ लोहे व स्टील इत्यादि माध्यमों से परमानेन्ट म्यूरल बनाए जाते हैं साथ ही फोटोग्राफी/डिजिटल तकनीक व विभिन्न प्रकाश माध्यमों की सहायता से अस्थायी म्यूरल भी बनाए जाते हैं। विदेशों में तो कई शहरों में लोग अपने घरों/या आफिसों के बाहरी हिस्सों को सम्पूर्ण म्यूरल कला के जरिए प्रदर्शित करवाते हैं।
टेक्सटाइल कला 
टेक्सटाइल कला अर्थात वस्त्र कला। इस कला के अन्र्तगत सामान्यत: ड्रांइग की गहन जानकारी के अलावा कपड़े पर अपनी कला को प्रस्तुत करने के तरीकों को सीखने की प्रक्रिया की ओर आगे बढ़ते रहते हैं। जैसे पहले पेपर पर ड्रांइग बनाना फिर परम्परागत व नई लूम मशीनों की सहायता से उनको कपड़े पर उतारना/धागों से कपड़े बनाने की प्रक्रिया/कपड़ों को रंगने इत्यादि कार्यों को प्रक्रिया को सीखते हैं। बंधनी कला अर्थात राजस्थानी शैली की साडिय़ां व दुपट्टे, बनारसी साडिय़ां इत्यादि इस कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं । स्कूलों, कालेजों व विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के अलावा टेक्सटाइल्स मिल्स/गारमैन्ट्स मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों व स्वतंत्र छपाईकला व स्क्रिन प्रिटिंग के जरिये इस विधा में अत्यन्त रोजगार के अवसर उपलब्ध हैं।
एप्लाइड आर्ट 
सामान्यत: पहले सभी कलाओं को व्यावहारिक कला का ही दर्जा प्राप्त था। लेकिन 19 वीं शताब्दी के प्रारम्भ व तकनीकों के लगातार विकास से यह कला विशेषत: विज्ञापन जगत की कला के तौर पर जानी जाने लगी। वर्तमान में इसे और संशोधित
करके कमर्शियल आर्ट अर्थात व्यापारिक कला के तौर पर मान्यता मिल रही है। जब से पृथ्वी पर व्यापार या समान खरीदने-बेचने की प्रक्रिया आरम्भ हुई, तभी से इस कला का चलन माना जा सकता हैं। इस कला में भी ड्राइंग की अहम जानकारी के साथ-साथ हमें ग्राफिक/कम्पोजिशन/ अक्षरों की पहचान/पोस्टर कला/विज्ञापन कला - समाचार पत्र/पत्रिकाओं में रोजाना छपने वाले विज्ञापन/दुकानों में दिखाई देने वाले पोस्टर/ग्लोसाइन बोड्र्स/डैगलडर्स/उत्पादों की पैकेजिंग व प्रस्तुतीकरण/टीवी पर रोजाना आने वाले विज्ञापन विभिन्न चैनलों का ग्राफिक प्रस्तुतीकरण इत्यादि के बारे में सतही स्तर से लेकर उच्च स्तर तक की शिक्षा ग्रहण करनी होती है। व्यावहारिक कला को सीखने के कई तर्क हैं। सर्वप्रथम किसी भी वस्तु का प्रचार करने के लिए उसका प्रस्तुतीकरण अत्यन्त आवश्यक है। इस प्रक्रिया को विजुएलाइजेशन कहते हैं। जो निरन्तर सीखने की प्रक्रिया से पारंगत होता है। इस कला की पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्र के पास कला क्षेत्र के सर्वाधिक रोजगार उपलब्ध रहते हैं। जैसे विज्ञापन संस्थानों में ग्राफिक डिजाइनर/विजुयेलैजर/आर्ट डायरेक्टर, प्रकाशन संस्थानों में ले आउट डिजाइनर/विजुयेलैजर/आर्ट डायरेक्टर/टीवी विज्ञापन जगत में आर्ट डायरेक्टर/सेट डायरेक्टर एनिमेशन, स्वयं की विज्ञापन संस्था इत्यादि तरीके के रोजगार उपलब्ध रहते हैं।
इलस्ट्रेशन कला
 इलस्ट्रेशन कला अर्थात रेखाचित्र, जो कि किसी कहानी, लेख या विचार की सजीवता प्रस्तुत करते हैं। सामान्यत: इस कला को सीखकर छात्र बच्चों की किताबों/कॉमिक्स बुक्स/पत्रिकाओं इत्यादि के साथ-साथ वर्तमान समय के सबसे रुचिपूर्ण शब्द एनिमेशन कला की ओर बढ़ते हैं। वास्तविक रूप में यह काफी धैर्य व समय के उपयोग की कला है, जिससे एनिमेशन फिल्मों इत्यादि में रोजगार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं जिसे हम द्विआयामी रेखाचित्रों का त्रिआयामी चित्रों व फिल्मों के जरिए प्रस्तुत करते हैं। इसमें इलेस्टे्रशन के साथ-साथ कम्प्यूटर पर उपलब्ध एनिमेशन साफ्टवेयरों के उपयोग पर खास ध्यान देना होता है। इसी के अन्तर्गत कार्टूनिंग कला भी आती है। इन्हें हम सामान्यत:/समाचार पत्र व पत्रिकाओं में देखते हैं।
फोटोग्राफी कला
विजुअल आर्ट में फोटोग्राफी कला का भी एक अहम पहलू है। इसमें हम वस्तु को सामान्य नजरिये से हटाकर एक विशेष नजरिए से नई तकनीक के साथ प्रस्तुत करते हैं। इसका सर्वाधिक उपयोग विज्ञापनकला के अन्र्तगत ही आता है। कई बार तो सिर्फ  फोटोग्राफ  ही बिना कुछ लिखे कई बातें व कहानियों के साथ-साथ उत्पादों की विशेषता बता देते हैं। वर्तमान में डिजिटल फोटोग्राफी तकनीक आने से यह कला कम खर्चीले व समय की काफी बचत व तुरन्त रिजल्ट देने वाली कला के रूप में भी प्रचलित हो रही है। इस कला को सीखने के बाद छात्र स्वयं का रोजगार जैसे फोटोग्राफी स्टूडियो/समाचार पत्र, पत्रिकाओं में प्रेस फोटोग्राफर, फिल्मों में स्टिल फोटोग्राफर, फैशन फोटोग्राफर,आर्किटेक्चरल फोटोग्राफर, इंडस्ट्रियल फोटोग्राफर या स्वतंत्र फोटोग्राफर के रूप में अपनी जीविका सम्मानपूर्वक तरीके से चला सकते हैं।
टाइपोग्राफी कला 
टाइपोग्राफी अर्थात लेखन की कला। इस कला के अन्तर्गत अक्षरों की बारीकियां जैसे उनकी बनावट, उनकी विशिष्टता व शैली इत्यादि की खोज पर ध्यान दिया जाता है। इसके अन्र्तगत कुछ समय पहले तक धातु की ढलाई करके बने हुए अक्षरों से लेटर प्रेस मशीन द्वारा छपाई होती थी। कम्प्यूटर तकनीक के आ जाने व अक्षरों की उपलब्धता व सुगमता के कारण अक्षर कला अर्थात टाइपोग्राफी का महत्व काफी बढ़ गया है। इस विधि के अन्तर्गत छात्र अपनी विशिष्ट लिखावट शैली व नई फॉण्ट इजाद कर सकते हैं। इसी के अन्तर्गत कैलीग्राफी कला भी आती है।
जिसकी सहायता से ब्रश/क्रोकिल/विभिन्न तरीके व स्ट्रोक के फाउण्टेन पेन व निब की सहायता से एक विशिष्ट शैली की स्वयं की लिखाई की डिजाइन प्रक्रिया को सीखा व अपनाया जाता हैं। यह आपकी रचनात्मकता को और सुगम बनाता है।
छपाई कला  
इसके अन्र्तगत प्रिंटिंग तकनीकों के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की जाती हैं व वर्तमान समय में आ रहे आधुनिक बदलावों को भी सिखाया जाता है। इस तकनीक के अन्तर्गत लेटर प्रेस/ ऑफसेट प्रिंटिंग/डिजिटल ऑफफसेट प्रिंटिंग/डिजिटल प्रिटिंग/साल्वेन्ट प्रिंटिग (फ्लैक्स/विनायल/वन वे विजन छपाई) स्क्रीन प्रिंटिंग आदि छपाई कला से जुड़ी तकनीकों को सिखाया जाता है। इन तकनीकों के माध्यम से किताबों/ समाचार पत्रों/ पत्रिकाओं/ पोस्टर/विज्ञापन सम्बन्धित अन्य छपाई के कार्यों इत्यादि के बारे में गहन जानकरी मिलती हैं। चूँकि एप्लाइड आर्ट से सम्बन्धित सभी कार्यों का नतीजा छपाई विधि द्वारा आना ही सम्भव है इसलिए डिजाइन बनाते समय छपाई सम्बन्धित तकनीकी जानकारियों जैसे पेपर साइज पेपर क्वालिटी/छपाई के तरीके। इत्यादि के बारे में जानकारी होना आवश्यक है।
प्लास्टिक आर्ट
 प्लास्टिक आर्ट या स्कल्पचर या मूर्तिकला-वर्तमान में नवीन माध्यमों के उपयोग के कारण सामान्यत: अब इसे प्लास्टिक आर्ट के नाम से जाना जाने लगा है। इस कला के लिए भी हमें सर्वप्रथम ड्राइंग की अहम शिक्षा का होना अत्यन्त जरूरी है। इसके बाद सर्वप्रथम मिट्टी के साथ अपने विचारों व भावों को एक मूर्त रूप या अमूर्त रुप देने की प्रक्रिया शुरू होती हैं। तत्पश्चात विभिन्न तरीकों के पत्थर जैसे सैण्ड स्टोन/रेडस्टोन/मार्बल्स इत्यादि पर हम अपने भावों को उपयुक्त औजारों व तकनीक की सहायता से प्रस्तुत करते हैं, तत्पश्चात लकड़ी-विभिन्न प्रकार की। अन्य नवीन माध्यमों जैसे प्लास्टर आफ पेरिस/ प्लास्टिक /लोहा/ स्टील/ एल्युमीनियम, वैक्स इत्यादि से अपनी विषय वस्तु को सजीव बनाने की प्रक्रिया व नवीन रचनात्मकता की ओर बढ़ते हैं। वर्तमान में इसमें किसी भी माध्यम व तकनीक को प्रस्तुतीकरण के साथ अत्यन्त आकर्षक माना जाता है। इसी के अन्र्तगत कई माध्यमों की एक साथ प्रस्तुत करने की नई कला इन्स्टालेशन आर्ट का भी उदय हो चुका है। जिसे आज एक विश्वव्यापी कला के रूप में भी  समर्थन मिल रहा है। इन्स्टालेशन आर्ट अर्थात परम्परागत तरीके सिर्फ  मिट्टी/लकड़ी या पत्थर के साथ-साथ एक ही कार्य में नवीन माध्यमों जैसे प्लास्टिक/स्टील/ब्रोन्ज इत्यादि का उपयोग करके उसे नई रचनात्मकता के साथ प्रस्तुत करना (फिल्म व संगीत को मिलाकर) भी सम्मिलित हैं। इस कला को सीखने के बाद छात्र अपनी प्रदर्शनियां लगाकर खुद व दूसरों के लिए भी रोजगार का अवसर उत्पन्न करते हैं।
पॉटरी 
सामान्यत: यह शब्द सुनते ही हमें चीनी मिट्टी के बने बर्तनों की याद तरोताजा हो जाती है। लेकिन वास्तविक रूप में यह एक विश्वव्यापी कला है एवं इसका एक वृहद् बाजार है। इसके अन्र्तगत रोजाना उपयोग में आने वाले घरेलू बर्तनों जैसे कप/प्लेट इत्यादि के साथ-साथ घर व ऑफिस के सजावटी फ्लावर पॉट इत्यादि की परम्परागत कुम्हारी तकनीक के साथ-साथ नवीनतम तकनीकों के मिश्रण से प्रत्येक वस्तु पर एक नई कलात्मक डिजाइन के रेखांकन द्वारा इसे बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। तत्पश्चात अपनी कृति के अनुसार रंगों का मिश्रण कर भट्टी में पकाने की क्रिया के साथ यह कार्य सम्पन्न होता है। इसमें हमेशा नवीनतम प्रयोगों की गुंजाइश रहती है। इसकी एक खास विशेषता यह है कि इसमें बनी किसी भी वस्तु की डिजाइन को तकनीकी रूप से दुबारा नहीं बनाया जा सकता है। इसलिए यह सामान्य कप/प्लेट बनाने की कला न होकर एक रचनात्मक पॉटरी कला के रूप में प्रसिद्ध है। इसमें सामान्यत: मिट्टी/सिरॉमिक इत्यादि वस्तुओं का उपयोग होता है इन कलाओं को सीखने के बाद छात्र अपने व अन्यों के लिए भी रोजगार के साधन जुटाने में प्रयत्नशील हो जाता है।
कला इतिहास 
सबसे अंतिम लेकिन सबसे महत्वपूर्ण विषय है-कला की शिक्षा। सही मायने में यह एक गंभीर विषय है। क्योंकि इसी विषय के पढऩे के बाद छात्रों को इतिहास को साथ-साथ नवीन व परम्परागत प्रयोगों की जानकारी मिलती है। साथ ही इसका समाज पर दिनों दिन पडऩे वाले प्रभाव की भी जानकारी मिलती है। सम्पूर्ण विश्व कला इतिहास के उदाहरणों व कला की परम्परागत व नवीनतम तकनीकों/रंगों के प्रयोग/पदार्थों के प्रयोग/विषयों के प्रयोग आदि के उदाहरणों से भरा पड़ा है। यह विषय प्रत्येक छात्र के लिए उतना ही गम्भीर है जितना कि अन्य सभी रुचिपूर्ण विषय गम्भीर हैं। इस विषय में पारंगत होने के बाद हम कला इतिहास शिक्षक के रूप में सम्मानित जीविका चला सकते हैं।   -गायत्री

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