शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

आभार...उदयपुर, आभार।



पिछले दिनों उदयपुर के कला जगत में कुछ समय बिताने का मौका मिला। दरअसल मैं वहां मूमल के लिए छोटे से नए सेंटर की तलाश में गई थी। सच कहूं तो मैं बहुत डरते-डरते गई। जयपुर से उदयपुर तक के नौ घंटे की यात्रा में अधिकांश समय यही सोचते बीता कि पता नहीं मेरा प्रस्ताव जानकर लोग क्या-क्या कहेंगे? शायद यही ज्यादा सुनने को मिलेगा कि- 'मूमल' को तो कोई जानता नहीं या हमने तो कभी इसका नाम नहीं सुना। लेकिन, उदयपुर के कला-जगत में पहुंच कर एक के बाद एक अनेक सुखद अहसास हुए।


झीलों की नगरी में न केवल अनेकों नियमित पाठकों से मुलाकात हुई बल्कि वार्षिक शुल्क देकर मूमल मंगाने वाले कलाकारों और विद्यार्थियों से रूबरू होने का मौका भी मिला। प्रदेश में कलाकारों की सबसे पुरानी और धीर-गंभीर संस्था 'टखमण' के प्रांगण में अनेक वरिष्ठ कलाकारों को 'मूमल' की प्रतीक्षा करते पाकर मैं हैरान रह गई। दरअसल कला दीर्घाओं के दौरे में खोने के कारण मैं यहां देर से पहुंची थी।मन ही मन अपनी अक्षम्य भूल के लिए लज्जित होते हुए मैं उनके बीच पहुंची। यहां देरी के लिए क्षमा या सॉरी जैसे शब्द पर्याप्त नहीं थे। एक चुप-सी लग गई। बात संपादक राहुलजी ने शुरू की।


कुछ देर में साफ हो गया कि बड़े कलाकारों का बड़प्पन क्या और कैसा होता है? यह भी जाना कि कोई कलाकार केवल बेहतर काम से ही बड़ा या वरिष्ठ नहीं हो जाता। इसके लिए बड़ा दिल और बड़ी सोच की भूमिका कितनी अहम होती है। देशभर में पहचान बनाने वाले उदयपुर के बड़े-बड़े कलाकारों ने बड़े भाईयों सी आत्मीयता से वातावरण को इतनी कुशलता से सामान्य बना दिया कि मैं सारी झिझक भूलकर छोटी बहन सी इठलाने लगी। 'मूमल' के लिए उनके सामने फरमाइशों के ढेर लगा दिए... और सब की सब पूरी हुईं। कोई किंतु-परंतु भी नहीं, झोली भर के मिली बड़े भाईयों की सी तथास्तु ही तथास्तु।


इससे पहले कमोबेश यही भाव उदयपुर की कला दीर्घाओं में देखने को मिला। ऊंची अरावली की गोद में छुपी किसी नीची सी दुकान में छुपी नन्हीं सी गैलेरी हो या गहरी झील के किनारे आच्छादित किसी बड़ी-सी बेल के बूटे-बूटे पर बिखरे मंहगे कामों वाली दमदार दीर्घा। कला के कद्रदानों की मिजाजपूर्सी के सभी सामानों से सजी नई शताब्दी की सोच वाली बहुमंजिली गैलेरी हो या जमीन से जुड़ कर कारागार में कैद कला को मुक्ताकाश में पंख फैलाने का अवसर देता कोई स्टूडियो। पेंटिग्स के विविध आयामों को आर्थिक रूप से संवारने में लगी कोई गैलेरी हो या केवल मूर्तिकला को नई जमीन मुहैया करता कोई स्कल्पचर कोर्ट। सभी एक से बढ़ कर एक।


लब्बो-लुआब ये कि झीलों की नगरी में बड़ी गैलेरीज के संचालकों की सच्ची सौम्यता उन्हें गुलाबी नगर की कुछ गैलेरीज के मनमौजी मालिकों से एक अलग पहचान देती है। आने वाले दिनों में अन्य प्रमुख गैलेरीज की तरह उदयपुर की आर्ट गैलेरीज से भी 'मूमल' का जुड़ाव होगा। कुल मिलाकर उदयपुर में मूमल को पहले से मिली हुई पहचान और ताजा रेस्पोंस से मैं उत्साहित हूं। वहां भी मूमल को जयपुर जैसा ही प्यार और दुलार मिले यही कामना है।


आभार...उदयपुर, आभार।

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

अखबार बाजार से संचालित हो या पाठक से?

'मूमल' का संचालन बाजार के हाथ में हो या पाठक के?
'मूमल' के लिए उसका प्रत्येक पाठक एक विचार है, बाजार नहीं। हमारी यह धारणा आज के उस दौर में भी बनी हुई है, जब अखबार पाठकों के लिए नहीं बाजार के लिए हो चले हैं। कुछ बरसों पहले तक पत्रकारिता एक मिशन के तौर पर की जाती थी। तब इस काम को शिक्षित वर्ग में आजिविका से ज्यादा समाजसेवा के तौर पर किया जाता था और अखबार जनता तक सही जानकारी पहुंचाने का एक मात्र भरोसेमंद माध्यम था। आज समाचार पत्र प्रकाशन एक उद्योग के रूप में स्थापित हो चुका है। इनमें बड़े-छोटे सभी हैं। कुछ छोटे समाचार पत्र-पत्रिकाओं का वर्ग ऐसा भी है जो अभी तक अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। कुछ इस स्थिति से उभर चुके 'मूमल' जैसे मझोले पत्र हैं, जो बाजार के प्रभाव में होते हुए भी अपने पाठकों को बाजार से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं।
संपादक हुए प्रबंधक
पिछले एक अर्से में सम्पादक नाम का जीव प्रबंधक बनकर रह गया है। आज तेजी से बढ़ते अखबार अपने संपादकों को सिखा रहें हैं कि वे अपने पाठकों को पहचानें। उनकी नजर में उन पाठकों का कोई महत्व नहीं है जिनके पास बड़े बाजारों में खर्च करने को अतिरिक्त पैसा नहीं है। संपादकों को सिखाया जा रहा है कि वे केवल उन्हीं पाठकों को लक्ष्य करें जो बाजार में बेहतर खरीदारी करने में सक्षम हैं। हर बार पाठक सर्वे की रिपोर्ट में सबसे पहले यही देखा जाता है कि किस अखबार में 'हैसियतÓ वाले पाठकों की संख्या कितनी है।

डाक्टर बोला क्या?
इतना सब होते हुए भी सब कुछ खत्म नहीं हो गया है अखबार में सामाजिक सरोकारों की पैरवी करने वालों और उन सरोकारों को अभिव्यक्ति देने वाले प्रकाशकों और संपादकों की कमी नहीं है। ऐसे में आज मैने कलम तो चलाई है, लेकिन बहुत सोच-विचार कर। प्रकाशक गायत्री जी ने हिदायत दे रखी है कि इस विषय पर सभी आक्षेपों का पूर्वाानुमान करके आलेख तैयार करुं। मूमल के अब तक के अनुभव से जुड़े हर बिंदु को इस प्रकार समेटूं, जिससे पाठकों के समक्ष यह तस्वीर साफ हो सके कि शिल्प व कला जैसे विषय विशेष पर अखबार निकालना किस प्रकार तलवार की धार पर चलने के समान है। प्रकाशक की यह चिंता है कि हमारे ईमानदार प्रयासों के बावजूद कहीं कोई यह न कह दे - 'क्या आपको डॉक्टर ने कहा कि केवल कला और शिल्प पर ही अखबार निकालो?Ó इसी चिंता को ध्यान में रखते हुए पत्रकारिता पेशे की परेशानियां परोस रहा हूं।
पत्रकार हुए मीडियाकर्मी
कुछ समय पहले तक की प्रेस अब मीडिया बन गई है। इसी के साथ पत्रकार मीडियाकर्मी होते जा रहे हैं। जब तक पत्रकारिता थी तब तक प्रेस थी, अखबार थे, छपे हुए शब्द थे। भले ही अखबार छोटे थे परन्तु अनके संपादक बहुत बड़े होते थे। यह सब बीते कल की बातें हो गई। अब अखबार से पिं्रट मीडिया बन गए समाचार पत्र पढऩे के साथ देखने वाला उत्पाद बन गए। ऐसे में इनके पाठक कम और दर्शक अधिक हो गए। पत्रकारिता जब बाजार का उत्पाद बन जाए तो पाठक या दर्शक केवल ग्राहक होकर रह जाते हैं। किसी अखबार का संचालन जब बाजार का काकस करने लगे, तब अभिव्यक्ति की आजादी, लोकतांत्रिक सिद्धंात, मानव अधिकारों की रक्षा और एक खुले और स्वतंत्र समाचार माध्यम की बातें करना बेमानी हो जाता है।निर्णय आपकाकुल मिलाकर आपको यह निर्णय करना है कि आप बाजार की ताकतों से संचालित होने वाला एक और अखबार चाहते हैं या कम से कम एक ऐसा अखबार चाहेंगे जो वास्तव में पाठकों द्वारा संचालित होता हो। पाठकों की भागीदारी या दबाव किसी अखबार को सही रास्ते पर चलने को मजबूर कर सकता है। मगर उसके लिए पाठक को भी अपनी भूमिका के बारे में सोचना होगा। क्या वह एक अच्छे अखबार को उसका वाजिब दाम देकर खरीदने को तैयार है? यदि वह मुफ्त में या नाम मात्र के दाम पर अखबार चाहता है, तो उसे वही मिलगा जो बाजार चाहेगा, क्योकि लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर वही भर रहा है। -राहुल सेन
चलते-चलते ये भी
नापाठक तो पाखंडी!
नापाठकों के जानकार उनके बारे में कहते हैं-'रीडर इज अ नाइस हिप्पोक्रेटÓ क्यों कि मुक्त बाजार जो दिशा देता है अखबार उसी पर चलते हुए जो सामग्री परोसता है वह कई बार खूब रस लेकर पढ़ी जाती है। पाठक एक तरफ तो ऐसी सामग्री मजे लेकर पढ़ता है और वहीं बाद में यह आलोचना भी करता है कि अखबार में गंभीरता नहीं रही... यह चलताऊ हो गया है।
संपादक पर भारी प्रबंधक
इन दिनों अखबारों के कंटेंट (विषय वस्तु) संपादक नहीं प्रबंधक तय करते हैं। वे पत्रकारिता और मनोरंजन के बीच की सीमा रेखा को मिटा रहे हैं। प्रबंधक अखबारों का कलेवर तय करते हुए बताते हैं कि नए अंक में पाठक अखबार में क्या देखना चाहते हैं। वे संपादक से यह अपेक्षा भी रखते हैं कि पढऩे के लिए अखबार में कम से कम एक ऐसी चटपटी खबर जरूर हो, जिसे लेकर चर्चा होती रहे। उसमें ज्यादा तेज नहीं भी तो कुछ मसाला जरूर हो। भले ही ऐसी खबरों से संपादक की गंभीरता और संजीदगी की छवि प्रभावित होती हो।

शुक्रवार, 6 मई 2011

वो जो अपना केनवास खुद गढ़ता है: विनय शर्मा












पृथ्वी की धूरी पर गोल-गोल घूमने का अहसास देते चित्र जो आपको अपने साथ बहाते हुए बचपन की गलियों के साथ इतिहास की सैर करवाने लगे तो निश्चित मानिए वह कृति जयपुर के चित्रकार विनय शर्मा की खूबसूरत सोच और कुशल तुलिका से उभरी अभिव्यक्ति है। पिछले एक अर्से से राजस्थान कला अकादमी के सचिव का कार्य संभाल रहे विनय ने अपने कार्यालय, घर और सामाजिक दायित्वों को निभाते हुए भी अपनी अभिव्यक्ति और रचनाकर्म के लिए बड़ी खूबी से समय निकाला है। हां उन्हीं चौबीस घंटो में से जो उन्हें, आपको, हमें और सबको मिले हैं।विनय के चित्रों में समय के साथ का जो जुड़ाव और लगाव दिखता है वही उनके चित्रों की वास्तविकता भी है और खासीयत भी। विनय की कृतियों की सहजता के बारे में उन्हीं से जानने का मन किया तो इस विचार से धूल छंटी कि किसी भी चित्र के निर्माण के समय उनका पूरा मन उनके बचपन के विभिन्न पहलुओं को छू रहा होता है। राजस्थान कि लालसोट स्थित ददिहाल और सवांसा गांव के ननिहाल के ग्रामीण परिवेश ने बचपन के कच्ची मिट्टी से मस्तिष्क पर कुछ स्थाई छाप छोड़ी हैं, वही परिवेश उनकी कृतियों में सहजता और निर्मलता का कारण बनता है।यदि कभी विनय के चित्रों को करीब से निहारने का अवसर मिले तो आप पाएंगे कि अलग-अलग प्रकार के हस्तनिर्मित कागज पर उनके चित्रों में चक्र और गोलाकार चित्रण के साथ किसी रस्सी के छोर, पुरानी बहियों और पोथियों की उपस्थिति, सुन्दर केलीग्राफी का समावेश जरूर मिलेगा। वे अपनी इस खासियतों के बारे में चर्चा के दौरान बताते हैं कि गांव के कच्चे-पक्के रास्तों पर चलती साइकिल का गोल घूमता पहिया हो या गोल कूए की जगत पर पानी खींचती गांव की महिलाओं के हाथों में आती-जाती रस्सी का छोर, सब आज भी उनके मन-मस्तिष्क पर अंकित है जो उनके चित्रों से झांकता हैं। यही सब हर बार नए-नए अंदाज से सामने आता है और कृतियों में अंकित होता रहता है। वैसे भी कला के बारे में विनय की स्पष्ट राय है कि 'मन के भावों की सहज अभिव्यक्ति और निर्मलता ही तो कला है।Óएबस्टे्रक्स, इंस्टालेशन, चित्रकारी, मूर्तिकला या फिर फोटोग्राफी जैसी हर विधा में प्रवीण विनय की हर रचना से उनका बचपन निकल कर बाहर आ रहा है। दिवंगत दादा आत्माराम सरस्वती द्वारा जजमानों की जन्म पत्रियों पर अंकित चित्रों व सुंदर लेखन की नकल से शुरू हुई विनय की कलायात्रा नित नए आयामों को छूते हुए देश-विदेश तक पहुंच कर अपनी धाक जमा चुकी है। देश-विदेश में हुए उनके कला प्रदर्शन की लम्बी सूचि दर्शाने का कोई प्रयोजन यहां उचित भी नहीं।एक और खास बात यह कि विनय के अधिकांश चित्रों में केनवास के स्थान पर या उसके साथ हैंडमेड पेपर ही काम में लिया जाता है। विभिन्न रंगों की विशेष बुनावट वाले अपने चित्रण की इस सतह को भी वे स्वयं अपनें हाथों से तैयार करते हैं बल्कि अपनी कृतियों के लिए कागज बनाते समय नए-नए प्रयोग भी करते रहते हैं। अपने बचपन में झांकते हुए वे बतातेे हैं कि नानाजी गणित के विद्वान थे। विभिन्न गणनाओं के समय एनके द्वारा स्लेट पर बाती से लिखे जा रहे अंकों और इस दौरान एक खास लय से उत्पन्न हो रही ध्वनि... बस लगता मन कहीं इतिहास को खुली आंखों से देख रहा है, इतने और इतने पुराने इतिहास को, जब शायद पृथ्वी की निर्माण प्रक्रिया चल रही होगी।सहज और निर्मल कला में स्वार्थ या व्यवसाय के स्थान के बारे में बात चलने पर विनय कुछ देर सोच में डूब जाते हैं फिर खामोशी तोड़ते हुए गंभीरता से कहते है कि 'हां, एक हद तक... कला में स्वार्थ का होना सही है, जब तक 'मैंÓ के लिए कुछ नहीं किया जा सकता तब तक दूसरों के लिए कुछ करने योग्य सामथ्र्य कैसे हो सकती है। वैसे भी हर व्यक्ति की अपनी हकीकत होती है और उसे उसके साथ ही रहना और जीना होता है।Ó मनुष्यता के बारे में विनय का मानना है कि व्यक्ति रचनाशील हो, जो हो चुका उसके पीछे नहीं दौड़े, दूसरों की खुशियों में अपनी खुशी तलाश सके और त्याग की भावना से काम करे तो अधिक बेहतर हो। अपने कला धर्म को बयां करते हुुए वे कहते हैं कि जिस सामाजिक परिवेश में हम रहते हैं उसका सम्मान करते हुए ऐसे मूर्त या अमूर्त चित्रण होना चाहिए जो देखने वाले को आकृषित करे वही चित्र की सार्थकता व कला की एकाग्रता है।






(विनय शर्मा से गायत्री की हुई बातचीत के अनुसार)

रविवार, 6 जून 2010

आय-हाय... अलग गिनो ना !

नगणना हो रही है। सुना है, सबको गिना जाएगा। हमें तो बस यही हांसिल होना है कि हमें कोई यह नहीं कह सकेगा... कि तुम्हें गिनता ही कौन है?

वैसे हमें कोई असामाजिक शौक नहीं है, लेकिन हमारे ही समाज के वयोवृद्ध खुंशवंत सिंह जी की तरह हमारे भी कुछ किन्नर मित्र हैं। उनका कहना है कि सेन भाई, इस बार सरकार हमें अलग से नहीं गिन सकती क्या? यहां बात केवल शारीरिक रूप से किन्नर की हो रही है। समाज में मर्दानगी जताने वाले शिखंडिय़ों की नहीं, उन्हें अलग से गिना गया तो अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं।


पिछली बार तो किन्नर मित्रों को गिनने के बाद यह पूछा गया था कि भई, नाम कहां शामिल करें? जिसने जहां चाहा लिखा दिया। सो कुछ किन्नर पुरुष हो गए और कुछ स्त्री। कुल मिलाकर किन्नर कोई नहीं रहा। अब तो कम से कम हमें अलग से गिनों। जब कुदरत ने ही हमें अलग से गिना है तो ये सरकार क्यों नहीं गिन सकती?जनगणना के पैमाने को खुले आम चुनौती देने वाले हमारे ये मित्र कहते हैं कि इनकी तादाद भी कोई कम नहीं है। कुल आबादी में एक फीसदी से ज्यादा हैं, अर्थात भारत में ही 1।6 करोड़ लोग ना पुरुष हैं ना स्त्री। जब यही इतने हैं तो हमारे सामाजिक शिखंड़ी कितने होंगे? सब जानते हैं, क्योंकि सभी शिखंड़ी हमारे इर्दगिर्द ही तो हैं।

अब जयपुर के जलमहल की महाभारत में ही देखिए, दोनों सेनाओं के बीच एक से बढ़कर एक, क्या नजर नहीं आ रहे? चलिए जलमहल को छोडि़ए, आमेर आ जाईए, यहां तो दीख ही रहे होंगे। जो कल तक हवेलियों के हक पर निजी लोगों के नाम की तालियां पीट रहे थे, अब ललित मोदी के सितारे गर्दिश में देख कर हवेलियों के सरकारी होने की तालियां पीटने लगे हैं। अब नाम भी बताना होगा क्या? हाय अल्ला, आखिर कब समझेंगे आप?

ललित मोदी से ध्यान आया, आई.पी।एल। की महाभारत के शिखंड़ी तो आप से छिपे नहीं है ना? अब गिरे-पड़े पर लात मारने को सभी तीसमार खां उतारू रहते हैं। चारा खाकर लाल हुए राबड़ी पति के लायक क्रिकेटर पुत्र को किसी टीम में नहीं लिया गया, सो उन्होंने भी लात मारी। मंहगाई के बाद जब किसी नए मुद्दे की तलाश में जुटी भाजपा ने भी टांगे चलाई, पर राजस्थान में महारानी सा की टीम के मैनेजर रहे मोदी के खिलाफ यहां बोलने वालों के गले अभी बैठे हुए लगते हैं। अब आमेर में ठंड़ी मलाई खाकर दिल्ली में आईपीएल की गरम हवा में निकल आए तो गला कैसे खुलेगा?

कुल मिलाकर तीस साल नौकरी करने के बाद भी हम तो बी।पी।एल। ही रहे, जब कि लोग तीन साल में देखते-देखते आई।पी।एल। हो गए। अब मेडिकल काउंसिल के आकाओं के आगे आईपीएल भी शर्मसार है। पूरे आईपीएल की कमाई इतनी नहीं जितनी एक केतन देसाई की हो सकती है। अब ढाई हजार करोड़ रुपए या डेढ़ टन सोना कितना होता है, इसकी कल्पना करने की भी तो कुवत होनी चाहिए। हम बीपीएल में वो कहां? आप तो एपीएल होंगे, तो आप कल्पना करके देखों। कैसा लगा?

अब कल्पना करते हुए बाबा रामदेव मत हो जाईए। कभी राजनेताओं का आसन अपने चरणों के पास पाकर पुलकित होते, तो कभी खुद राजनीति में आने की कल्पना करते और नेताओं के पदचिन्हों पर चलते बाबा कब कपालभाटी हो गए, शायद खुद उन्हें भी पता नहीं चला। नेताओं की तरह दूर की कौड़ी सा एक चांदी का वर्क लेकर आए। कहने लगे, उसे मृत पशुओं की आंत और चमड़े के बीच रखकर कूटा जाता है, इसलिए वर्क का सेवन मांसाहार समान है।

सब जानते हैं, मुस्लिम समुदाय का ही एक हिस्सा वर्क बनाने के काम मे जुटा है। अब वर्क कोई आज इस तरीके से बनने लगा है क्या? सदियों से ऐसे ही बनता और सेवन किया जाता रहा है। अब जनता चाहे जितनी भी भोली हो, लेकिन इतनी भी नहीं कि वह वर्क के पीछे वर्क कर रहे दिमांग की उपज नहीं भांप सके।

खैर..... इस नॉनसेंसी मसले पर मारामारी करना अपनी समस्या नहीं है, हलवाई और पान वाले की उतनी नहीं है। यह समस्या तो रामजी और उनके परम भक्त बजरंगबली की ज्यादा है, जब वर्क नहीं होगा तो हर मंगलवार और शनिवार को बाबा का चोला कैसे चढेगा? ये तो राम जानें....या बाबा रामदेव ....

टेक केयर फॉर वर्क, बाय -सेन



शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

'प्रदर्शन में महावीर प्रसाद शर्मा

'प्रदर्शना' पक्ष के मानद संपादक के रूप में इस ब्लॉग से जुड़े श्री महावीर प्रसाद शर्मा का जन्म 26 जनवरी 1967 के दिन जालंधर में हुआ। मूलत: कश्मीर निवासी महावीर जी के पिता स्व। श्री नारायण कुमार शर्मा चूंकि उच्चपदस्थ शासकीय सेवाओं में थे, अत: आरम्भिक शिक्षा विभिन्न शहरों में हुई।

सन् 1974 में माता श्रीमती उर्मिला शर्मा ने जयपुर में कारपेट निर्माण का कारोबार शुरू किया। महावीर को उन्हीं दिनों शहर के सबसे प्रतिष्ठित सेन्ट जेवीयरर्स स्कूल के छात्र होने का गौरव मिला। माता के व्यवसाय के प्रति रूझान हुआ। शिक्षा के साथ-साथ वह मां के कारोबार में भी सहयोग करते रहे।बास्केट बॉल खिलाड़ी महावीर को टीम कोच के रूप में सन् 1986 में अमेरिका जाने का मौका मिला। वहां उन्होंने कारपेट आयात की संभावनाएं टटोली। 1987 में उनको फिर बॉस्केट बॉल कोच के रूप में अमेरिका जाना हुआ तब वहां के एक स्थानीय व्यक्ति के साथ मिल उन्होंने भारत से कारपेट और ज्यूलरी आयात शुरू किया और 1994 तक वहीं न्यूर्याक व बोस्टन में रहे। 1994 में वह वापस जयपुर आए और मां द्वारा स्थापित कारोबार को कारपेट निर्यात व्यवसाय के रूप में नई ऊंचाईयों तक पहुंचाया।

सन् 2002 में जीवन साथी के रूप में दीपिका को पाने के बाद इनका जीवन पूर्ण रूपेण प्रकाशित हो उठा।पढऩे व दुनिया को देखने, समझने व विभिन्न व्यक्तियों के प्रस्तुत व्यवहार का अध्ययन करने में रूचि रखने वाले महावीर शर्मा की गिनती परफोरमिंग आर्ट के प्रमुख जानकारों में की जाती है। इसी के चलते मानवता की सेवा करने का उद्देश्य लिए विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हैं। आज वह अपने व्यवसाय के साथ-साथ जयपुर विरासत फाउण्डेशन, कैन, रवीन्द्र मंच कमेटी, त्रिमूर्ति, जे जे एस, जस और फोरेक्स सहित कई संगठनों के शीर्ष व महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

तमाम व्यस्तताओं के बावजूद महावीर शर्मा ने 'मूमल' के प्रदर्शन कला पक्ष 'प्रदर्शना' की देखरेख के लिए अलग से समय सुरक्षित किया है। प्रदर्शन कला के क्षेत्र में आने वाले युवा साथियों के लिए उनका संदेश है कि ''कला में कामर्शिगल एंगल से कोई कम्प्रोमाइज न करें। जमाने के साथ कला को तोड़-मरोड़ कर पेश करने के बजाय उसके मूल स्वरूप को बरकरार रखें। आप मंच पर मूल कला की कद्र करेंगे तो कला समाज में आपकी कद्र कराएगी।"

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

अब्दुला दीवाना


फ्रॉम नॉनसेंस डेस्क

पिछले दिनों पाठकों से 'मूमल' का गेटअप सुधारने के लिए चाहे गए सुझावों में आपने जो सक्रीयता दिखाई, उसी का नतीजा है कि आपके इस सेन की डेक्स पर नॉनसेंस सरीखा कॉलम लिखने का काम फिर से आ पड़ा। अब कला संस्कृति जैसे गंभीर विषय के इस प्रकाशन में आपको यह भी रुचता है, तो यह आपकी समस्या है।

खैर.....अभी तो 'मूमल' के प्रवेश की धूमधाम में अपन अब्दुला से दीवाने हो रहे हैं। क्यों नहीं हो सकते भई? जब सानिया की सादी में सारा देश अब्दुल्ला हो सकता है, तो हम चीज ही क्या हैं? अब ये बात तो आप पर भी साफ हो गई होगी कि तलाक पाना भी शादी का सुख हंासिल करने से ज्यादा अहम हो सकता है। नहीं मानों तो आयशा आपा से पूछ लो। कुल पांच सौ रुपए की मेहर के पीछे हिन्दुस्तान पाकिस्तान एक कर दिया। भई हम तो पांच सौ ही जानते हैं, अब आपने पन्द्रह करोड़ जाना है तो यह फिर आपकी समस्या है।

अब समस्या तो ये भी है कि ये जयपुर के जलमहल की समस्या क्या है? किसी तूती सी आवाज ने मुद्दा उठाया और अखबारों ने उसे ताड़ सा बना कर एम्पलीफाईड कर दिया। विरासत बचाने के शोर से उठा ध्वनि प्रदुषण कम करने के लिए प्रभावित पक्ष ने अखबारों में विज्ञापनों की आहुति डाली तो कुछ दिन शोर कम हुआ। अब अखबार में विज्ञापन तो इंसानी पेट जैसा है, रोज फुल भरो पर अगले दिन फिर ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर सभी चाहिए, सो जलमहल की खबर तो आपको फिर-फिर पढऩी ही है। लेकिन, अगला प्रभावित भी तो इस बिजनेस में पूरी तैयारी से उतरा है। अब की बार उसने व्यापारियों के शिष्ट मंडल को जलमहल का विकास दिखाने के लिए न्यौता, न्यौते हुओं ने वहां जाकर विकास का जायका लिया और सराहा। अब हाथी के पांव में सबका पांव, सो अभी व्यापारिक अखबारगन को विज्ञापन नहीं देने पड़ रहे।

उधर जयपुर के आमेर में हाथी के पांव विदेशी पावणों के लिए समस्या होते जा रहे हैं। अब इनके लिए तो हाथी पर बैठे बिना आमेर तो क्या, जयपुर ट्यूर भी सार्थक नहीं माना जा सकता। ले-देकर आफत होती है, ट्यूर आयोजक और गाईड की। कहते हैं 'सेनजी, आमेर का हाल तो आपके नॉनसेंस से भी ज्यादा खराब है। हाथी, वक्त और फेरे तो गिनती के और सवार अनगिनत। अब हम जानें या ना जानें पर परदेसी पावणें बेहतर जानते है कि जिन्हें जो करनी-करानी हो जल्दी कर लो, क्यों कि ना, अब हाथियों के पांव भारी नहीं हो रहे। कुल मिलाकर आमेर में हाथी की सवारी का वक्त बुरा आ गया है।

जबकि अपने नाम के पहले फेवीकोल के जोड़ सा कुमारी लगाने वाली शैलजा बाईसा का कहना है कि 'पर्यटन व्यवसाय का बुरा वक्त अब गुजरा है।' ट्रेवल बाजार में आई कुमारी जी को कोई यह बताने वाला नहीं मिला कि वास्तव में यहां हाल काफी गया गुजरा है। उन्हें इस बात का तब भी अंदाजा नहीं लगा, जब हमारी काक सा ने उन्हें साफ बताया कि रूरल ट्यूरिस्म के लिए अभी हम गांवों की पहचान ही कर रहे हैं। प्रदेश की शाही ट्रेनों के गए गुजरे हाल की बात भी यहां गटक ली गई। देश में ट्यूरिस्ट इंडस्ट्री की ग्रोथ के आंकड़ों में गुम हुई प्रदेश के पर्यटन की समस्या तो यहां के ऑपरेटर्स की है, मिनिस्टर्स की तो नहीं। अब नॉनसेंसी चलेगी, तो कहने-सुनने और समझने की बातां भी चलेगी ही। अब सारी तो एक साथ हो भी नी सके, सो अभी फिलहाल यहीं इति,

........टेक केयर फॉर ट्यूरिस्म,

बाय...... -सेन

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

मूमल के शक्ति स्तम्भ

कहते है ठोस जानकारियां आपको प्रमाणिक बनाती है तथा संगठन में शक्ति निहित होती हैे। अब 'मूमलÓ परिवार में भी अपने-अपने क्षेत्र की गहरी, ठोस व प्रमाणिक जानकारी रखने वाली शख्सियतें जुड़ी हंै। जिनके संरक्षण में सम्बन्धित क्षेत्र के ब्लाग्स का प्रकाशन किया जाएगा। मूमल के साथ अब वरिष्ठ पत्रकार श्री राहुल सेन के अलावा शिल्पी के लिए श्री दिलीप बैद, गलियारा में पेंटिग व स्क्लपचर्स के लिए डॉ। अनुपम भटनागर, यात्रा में पर्यटन के लिए श्री बहादुर सिंह राजावत और मंचीय प्रदर्शन के लिए श्री महावीर प्रसाद शर्मा जैसे अनुभवी व्यक्तित्व शक्ति स्तम्भ के रूप में रहेंगे। संबधित ब्लाग्स पर मूमल के इन्ही शक्ति स्तम्भों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है, जिनके नेतृत्व में मूमल के पाठक अब क्षेत्र विशेष की प्रमाणिक व रोचक जानकारियों से लाभान्वित हो सकेंगे। इनसे जुड़े ब्लाग्स पर जाने के लिए मेरी प्रोफाइल पर क्लिक करें।

यहां प्रस्तुत है समन्वयक संपादक के रूप में श्री राहुल सेन का परिचय


पश्चिम बंगाल से राजस्थान आए सेन वंश के बंगाली परिवार में 30 अगस्त 1957 में जन्में श्री राहुल सेन की पैदाईश कोटा में हुई और परवरिश जयपुर में। कॉलेज शिक्षा पूरी करने के बाद पत्रकारिता का क्षेत्र चुना और राजस्थान पत्रिका से केरियर शुरू किया। प्रतिष्ठित रुद्र परिवार की कन्या साधना का सामिप्य पाने के बाद 17 नवम्बर 1979 में इनसे परिणय सूत्र में बंधे। राजस्थान पत्रिका में 15 साल कार्य के दौरान विभिन्न नगरों में रिर्पोटिंग और 'आओ गांव चलेंÓ कॉलम लिखते हुए राजस्थान के इतने गांव देख डाले की अब खुद भी उनकी गिनती नहीं कर पाते। यही कारण है कि राजस्थान का प्रत्येक पक्ष राहुल जी की रक्त शिराओं में रचा-बसा है।

मानवीय संवेदनाओं की चरम पीड़ा तक पहुंच कर व्यंग कर लेना और व्यंग के बीच कड़वे-मीठे सच सा आईना दिखा देना, इनके लेखन को औरों से अलग पहचान देता है। विभिन्न पुरस्कारों और अलंकरणों से सम्मानित राहुल जी ने पत्रकारिता के प्रतिष्ठित सम्मान 'कड़वा-मीठा सचÓ पुरस्कार से तीन बार सम्मानित होने के बाद खुद को पुरस्कारों की होड़ से अलग कर लिया। प्रसिद्ध माणक अलंकरण का प्रस्ताव केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया, क्योंकि इसके लिए आवेदन करना होता है।

इसके बाद दैनिक भास्कर में चीफ रिर्पोटर और ब्यूरो चीफ के रूप में विभिन्न एडीशनों में 10 साल से अधिक समय तक कार्य किया। समाज के श्रेष्ठ और उच्च पदस्थ वर्ग की क्रीमी लेयर के साथ उठते-बैठते केरीयर के पीक में अचानक पैसे, पद और प्रतिष्ठा से मोह भंग हुआ। एक दिन सब छोड़-छाड़ कर मानसिक विमंदित बच्चों और उनके अभिभावकों की मदद में जुट गए। अपने स्तर पर इनके लिए नि:शक्तों को समर्पित एक पाक्षिक समाचार पत्र 'शुभदाÓ का प्रकाशन भी शुरू किया। इन्हीं दिनों 'मूमलÓ के सम्पर्क में आए और इसका संपादन कार्य भी संभाला, वर्तमान में भी इस दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।

राहुल जी मूमल की विकास यात्रा के सबसे निकटतम सहयोगी और साक्षी हैं।श्रद्धेय कर्पूर चन्द 'कुलिशÓ द्वारा समय-समय पर दी गई सीख के मुताबिक जीवन में सफलता के सूत्र के रूप में राहुल जी का मानना है कि आप अपना मुंह धोने का उपक्रम करें, हाथ तो स्वत: ही धुल जाएंगें।